ऑस्ट्रेलिया
क्या अमेरिकी सेना पर्यावरण के लिए सबसे बड़ा खतरा है? सैन्य उत्सर्जन पर उठते गंभीर सवाल
ICN24 Newsroom 3 अग॰ 2026, 06:37 am

अमेरिकी सेना दुनिया की सबसे बड़ी संस्थागत कार्बन उत्सर्जक है, जिसका प्रदूषण स्तर 140 देशों से भी अधिक है, फिर भी इसके आंकड़े अक्सर सार्वजनिक नहीं किए जाते।
जलवायु परिवर्तन के इस दौर में जहां दुनिया के तमाम देश और बड़ी कंपनियां अपने कार्बन फुटप्रिंट को कम करने का दावा कर रही हैं, वहीं एक ऐसी संस्था है जिसका प्रदूषण स्तर दुनिया के 140 देशों से भी अधिक है। हम बात कर रहे हैं अमेरिकी सेना की, जिसे दुनिया का सबसे बड़ा संस्थागत उत्सर्जक (Institutional Emitter) माना जाता है। हालिया शोध और पर्यावरणीय विशेषज्ञों की चेतावनियों ने इस मुद्दे को फिर से चर्चा में ला दिया है कि क्या राष्ट्रीय सुरक्षा की आड़ में हमारे पर्यावरण के साथ बड़ा खिलवाड़ हो रहा है।
अमेरिकी रक्षा विभाग, यानी पेंटागन, दुनिया में ईंधन का सबसे बड़ा उपभोक्ता है। इसकी विशाल सैन्य मशीनरी, जिसमें जेट फाइटर, विमान वाहक पोत और हजारों बख्तरबंद गाड़ियां शामिल हैं, भारी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन करती हैं। आंकड़ों के अनुसार, यदि अमेरिकी सेना एक देश होती, तो वह उत्सर्जन के मामले में दुनिया के शीर्ष 50 देशों में शामिल होती। इसके बावजूद, अंतरराष्ट्रीय जलवायु समझौतों, जैसे कि 1997 के क्योटो प्रोटोकॉल में सैन्य उत्सर्जन को रिपोर्टिंग से छूट दी गई थी, जिसका असर आज भी दिखाई देता है।
ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय के लिए यह मुद्दा केवल वैश्विक राजनीति तक सीमित नहीं है। ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के बीच गहरे सैन्य संबंधों, विशेष रूप से ऑकस (AUKUS) समझौते के तहत बढ़ती रक्षा गतिविधियों का सीधा असर हिंद-प्रशांत क्षेत्र के पर्यावरण पर पड़ता है। ऑस्ट्रेलिया में होने वाले बड़े सैन्य अभ्यास, जैसे 'टैलिसमैन सेबर', में भारी संसाधनों का उपयोग होता है। भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई प्रवासियों के लिए, जो अक्सर भारत और ऑस्ट्रेलिया दोनों जगह जलवायु परिवर्तन के प्रभावों (जैसे बाढ़ और सूखा) को करीब से देखते हैं, यह पारदर्शिता की कमी एक बड़ी चिंता का विषय है।
भारत ने हमेशा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जलवायु न्याय (Climate Justice) की वकालत की है। जब विकसित राष्ट्र विकासशील देशों पर उत्सर्जन कम करने का दबाव बनाते हैं, तो अमेरिकी सेना जैसे विशाल संस्थानों के 'गुप्त' उत्सर्जन पर चुप्पी सवाल खड़े करती है। पर्यावरणविदों का तर्क है कि जब तक सैन्य गतिविधियों के कार्बन फुटप्रिंट को आधिकारिक गणना में शामिल नहीं किया जाता, तब तक 'नेट-जीरो' के वैश्विक लक्ष्यों को प्राप्त करना असंभव है।
विशेषज्ञों का कहना है कि सैन्य अभियानों की गोपनीयता और राष्ट्रीय सुरक्षा की दुहाई देकर उत्सर्जन के आंकड़ों को छिपाना अब स्वीकार्य नहीं होना चाहिए। जैसे-जैसे जलवायु संकट गहरा रहा है, सैन्य शक्ति और पर्यावरणीय स्थिरता के बीच संतुलन बनाना समय की मांग है। ऑस्ट्रेलिया और भारत जैसे देशों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सैन्य उत्सर्जन की अनिवार्य रिपोर्टिंग के लिए दबाव बनाना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित और स्वच्छ ग्रह सुनिश्चित किया जा सके।
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