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सुना है क्या: उत्तर प्रदेश की सियासत में 'खेल प्रतिशत का' और अनसुनी मिन्नतों की चर्चा

ICN24 Newsroom 9 जून 2026, 05:30 pm
सुना है क्या: उत्तर प्रदेश की सियासत में 'खेल प्रतिशत का' और अनसुनी मिन्नतों की चर्चा

उत्तर प्रदेश के सियासी गलियारों में इन दिनों 'खेल प्रतिशत का' और अफसरों की बेरुखी के किस्से आम हैं, जो सत्ता के भीतर के समीकरणों की नई कहानी कह रहे हैं।

उत्तर प्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक गलियारे इन दिनों चर्चाओं और कानाफूसियों से गर्म हैं। हालिया घटनाक्रमों ने राजधानी लखनऊ के पावर सेंटर्स में तीन प्रमुख किस्सों को जन्म दिया है, जो न केवल शासन व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं, बल्कि सत्ता के भीतर चल रही खींचतान को भी उजागर कर रहे हैं। इन कहानियों में सबसे प्रमुख 'खेल प्रतिशत का' है, जिसने विभागीय कार्यशैली और भ्रष्टाचार के पुराने जिन्न को फिर से बाहर निकाल दिया है। पहला किस्सा एक शक्तिशाली विभाग से जुड़ा है, जहाँ कथित तौर पर टेंडरों और परियोजनाओं में एक निश्चित 'कमीशन' या प्रतिशत तय किया गया है। चर्चा है कि बिना इस 'खेल' को समझे फाइलों का आगे बढ़ना नामुमकिन हो गया है। यह स्थिति न केवल विकास कार्यों को प्रभावित कर रही है, बल्कि ईमानदार अधिकारियों के लिए भी धर्मसंकट पैदा कर रही है। ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए, जो भारत में निवेश और पारदर्शी शासन की उम्मीद रखते हैं, इस तरह की खबरें चिंता का विषय हो सकती हैं क्योंकि यह सीधे तौर पर ईज ऑफ डूइंग बिजनेस को प्रभावित करती हैं। दूसरा किस्सा 'बधाई तक नहीं कबूल' किए जाने से जुड़ा है। बताया जा रहा है कि शासन के शीर्ष स्तर पर कुछ अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बीच दूरियां इतनी बढ़ गई हैं कि शिष्टाचार के नाते दी जाने वाली बधाइयों को भी नजरअंदाज किया जा रहा है। एक वरिष्ठ नेता द्वारा भेजे गए शुभकामना संदेश को जिस तरह से ठुकराया गया, वह प्रशासनिक अहंकार या फिर गहराते राजनीतिक मतभेदों का संकेत दे रहा है। यह घटना दर्शाती है कि उत्तर प्रदेश की नौकरशाही में इस समय 'सब कुछ ठीक नहीं' है। तीसरा वाकया उन 'मिन्नतों' का है जो काम न आईं। सूत्रों के अनुसार, तबादलों और नियुक्तियों के इस दौर में कई रसूखदार लोगों ने पैरवी की, गिड़गिड़ाए, लेकिन उनकी एक न सुनी गई। 'काम न आईं मिन्नतें' का यह किस्सा यह बताता है कि या तो सिस्टम में शुचिता लाने की कोशिश की जा रही है, या फिर पावर का रिमोट कंट्रोल किसी ऐसे हाथ में है जो पारंपरिक सिफारिशों को तवज्जो नहीं दे रहा है। ये तीनों किस्से मिलकर यूपी की मौजूदा राजनीतिक तस्वीर को बयां करते हैं। जहाँ एक तरफ भ्रष्टाचार के आरोप 'प्रतिशत' के रूप में तैर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ संवादहीनता और कठोरता ने प्रशासनिक मशीनरी को उलझा कर रख दिया है। भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई प्रवासियों के लिए, जो उत्तर प्रदेश से गहरा जुड़ाव रखते हैं, वहां की शासन व्यवस्था में होने वाला हर बदलाव उनके पैतृक निवेश और सामाजिक हितों को प्रभावित करता है। आने वाले दिनों में देखना होगा कि क्या ये किस्से केवल चर्चा का विषय बने रहेंगे या शासन इनमें सुधार के लिए कोई ठोस कदम उठाएगा।
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