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भारतीय तेल आयात का इतिहास: जब कच्चे तेल की बास्केट में ईरान की हिस्सेदारी 10% से अधिक थी
ICN24 Newsroom 24 जून 2026, 05:11 pm
पिछले दशक के आंकड़ों से पता चलता है कि ईरान भारत का एक प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ता था, जिसकी हिस्सेदारी कुल आयात के दसवें हिस्से से भी अधिक हो गई थी।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा के इतिहास में ईरान एक समय अत्यंत महत्वपूर्ण स्तंभ रहा है। पिछले दशक के उत्तरार्ध में, विशेष रूप से 2017 से 2019 के बीच, भारत के कुल कच्चे तेल के आयात में ईरान की हिस्सेदारी बढ़कर 10 प्रतिशत से अधिक हो गई थी। यह वह दौर था जब ईरान, सऊदी अरब और इराक के साथ भारत के शीर्ष तीन तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल था।
आंकड़ों के अनुसार, 2010-11 के बाद से ईरान की हिस्सेदारी में उतार-चढ़ाव देखा गया, लेकिन 2016 में परमाणु समझौते के बाद अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों में ढील मिलने से द्विपक्षीय व्यापार को बड़ी गति मिली। ईरान द्वारा दी जाने वाली आकर्षक छूट, कम परिवहन लागत और 'रुपया-रियाल' भुगतान तंत्र ने भारतीय रिफाइनरियों के लिए ईरानी तेल को एक किफायती विकल्प बना दिया था।
विशेषज्ञों का मानना है कि उस समय ईरान की 10% से अधिक की हिस्सेदारी भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और ऊर्जा विविधीकरण की नीति का हिस्सा थी। हालांकि, 2018 में अमेरिका द्वारा जेसीपीओए (JCPOA) समझौते से हटने और ईरान पर फिर से कड़े प्रतिबंध लगाने के बाद, भारत को अपने आयात ढांचे में बड़ा बदलाव करना पड़ा। 2019 के मध्य तक, अमेरिकी दबाव के चलते भारत ने ईरान से तेल आयात को लगभग शून्य कर दिया, जिससे भारतीय तेल बास्केट का संतुलन पूरी तरह बदल गया।
वर्तमान परिदृश्य में, भारत ने ईरान की कमी को पूरा करने के लिए पहले इराक और फिर हाल के वर्षों में रूस की ओर रुख किया है। रूस अब भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा है, जो कुल आयात का लगभग 35-40% हिस्सा कवर करता है। इस बीच, ऑस्ट्रेलिया जैसे देश भी वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा संवाद में भारत के साथ जुड़ रहे हैं, क्योंकि वैश्विक तेल कीमतों में अस्थिरता का सीधा असर ऑस्ट्रेलिया में ईंधन की कीमतों और भारतीय प्रवासियों की क्रय शक्ति पर पड़ता है।
ऑस्ट्रेलियाई परिप्रेक्ष्य में देखें तो, सिडनी और मेलबर्न जैसे शहरों में रहने वाले भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय के लिए वैश्विक ऊर्जा राजनीति केवल खबरों तक सीमित नहीं है। भारत द्वारा अपनी तेल बास्केट का विविधीकरण करना न केवल दक्षिण एशिया में मुद्रास्फीति को नियंत्रित रखने के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला की स्थिरता को भी सुनिश्चित करता है, जिसमें ऑस्ट्रेलिया एक प्रमुख ऊर्जा निर्यातक के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
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