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विदेशों में भारतीयों का व्यवहार: नागरिक जिम्मेदारी और देश की छवि पर एक विमर्श

ICN24 Newsroom 5 जून 2026, 12:30 pm
विदेशों में भारतीयों का व्यवहार: नागरिक जिम्मेदारी और देश की छवि पर एक विमर्श

वरिष्ठ पत्रकार आरती जेरथ के लेख के संदर्भ में, यह रिपोर्ट विदेश यात्रा के दौरान भारतीयों के व्यवहार और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की साख पर उसके प्रभाव का विश्लेषण करती है।

हाल के वर्षों में अंतरराष्ट्रीय पर्यटन और प्रवासन के क्षेत्र में भारत की उपस्थिति तेजी से बढ़ी है। हालांकि, इस बढ़ती संख्या के साथ एक नई चुनौती भी सामने आई है—विदेशों में भारतीयों का सार्वजनिक व्यवहार। वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक आरती जेरथ के हालिया विचारों ने इस बहस को एक नई दिशा दी है कि कैसे व्यक्तिगत आचरण सीधे तौर पर देश की वैश्विक छवि या 'सॉफ्ट पावर' को प्रभावित करता है। सोशल मीडिया पर अक्सर ऐसे वीडियो सामने आते हैं जहाँ भारतीय पर्यटकों के व्यवहार को लेकर सवाल उठाए जाते हैं, जो अंततः पूरे समुदाय के प्रति धारणा को प्रभावित करते हैं। ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में, जहाँ भारतीय समुदाय सबसे तेजी से बढ़ने वाले प्रवासी समूहों में से एक है, यह मुद्दा और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। मेलबर्न से सिडनी तक, भारतीय न केवल आर्थिक योगदान दे रहे हैं, बल्कि वे भारत के 'सांस्कृतिक राजदूत' के रूप में भी देखे जाते हैं। जब कोई पर्यटक या नया प्रवासी स्थानीय नियमों का उल्लंघन करता है या सार्वजनिक शालीनता का ध्यान नहीं रखता, तो इसका खामियाजा उस देश में रह रहे स्थायी भारतीय निवासियों को भी भुगतना पड़ सकता है। जेरथ के अनुसार, यह केवल शिष्टाचार का मामला नहीं है, बल्कि यह एक नागरिक कर्तव्य है। भारत वर्तमान में विश्व पटल पर एक उभरती हुई शक्ति के रूप में अपनी पहचान बना रहा है। सरकार की कूटनीतिक कोशिशों के साथ-साथ, आम नागरिकों का व्यवहार भी उतना ही मायने रखता है। विदेशी जमीन पर किया गया एक गलत व्यवहार वर्षों की कूटनीतिक मेहनत और 'ब्रैंड इंडिया' की छवि को नुकसान पहुँचा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या के समाधान के लिए 'संस्कृति के प्रति संवेदनशीलता' और नागरिक शिक्षा की आवश्यकता है। यात्रियों को यह समझना होगा कि वे केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक देश का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया में भारतीय प्रवासियों ने अक्सर यह अनुभव किया है कि सार्वजनिक स्थानों पर शोर-शराबा या नियमों की अनदेखी करने से नस्लीय रूढ़िवादिता को बढ़ावा मिलता है। निष्कर्षतः, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का सम्मान बढ़ाना केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। जैसा कि जेरथ तर्क देती हैं, दुनिया के सामने देश की एक सकारात्मक और सभ्य छवि पेश करना हर उस भारतीय का फर्ज है जो अपनी सीमाओं से बाहर कदम रखता है। यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राष्ट्रीय प्रतिष्ठा के बीच संतुलन बनाने का समय है।
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