राजनीति
ढाका की राजनीति और भारत-बांग्लादेश संबंधों की नई परीक्षा: शेख हसीना की वापसी की घोषणा से बढ़ी हलचल
ICN24 Newsroom 8 अग॰ 2026, 05:37 am

शेख हसीना की 2026 में वापसी की घोषणा ने दक्षिण एशिया में राजनीतिक हलचल तेज कर दी है, जिससे भारत के लिए कूटनीतिक चुनौतियां बढ़ गई हैं।
बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना द्वारा दिसंबर 2026 में स्वदेश लौटने की हालिया घोषणा ने न केवल ढाका के गलियारों में, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया में एक नई राजनीतिक हलचल पैदा कर दी है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब बांग्लादेश एक बड़े सत्ता परिवर्तन, वैचारिक ध्रुवीकरण और संस्थागत अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है। शेख हसीना की वापसी की यह योजना केवल एक राजनीतिक वापसी नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र के बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों और भारत-बांग्लादेश संबंधों के भविष्य के लिए एक कड़ी परीक्षा भी साबित होने वाली है।
अगस्त 2024 में हुए छात्र विद्रोह और उसके बाद तख्तापलट जैसी स्थितियों के बीच शेख हसीना को देश छोड़कर भारत में शरण लेनी पड़ी थी। वर्तमान में बांग्लादेश की कमान नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के हाथों में है। इस सरकार के सामने देश में कानून-व्यवस्था की बहाली और निष्पक्ष चुनाव कराने की बड़ी चुनौती है। हसीना के लौटने की घोषणा ने अवामी लीग के समर्थकों में नई जान फूंकने की कोशिश की है, लेकिन साथ ही इसने देश के भीतर चल रहे तनाव को और गहरा दिया है।
भारत के लिए यह स्थिति कूटनीतिक दृष्टिकोण से अत्यंत संवेदनशील है। दिल्ली ने दशकों तक शेख हसीना की सरकार के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए रखे थे, जिससे सीमा सुरक्षा, आतंकवाद विरोधी अभियान और कनेक्टिविटी परियोजनाओं में बड़ी सफलता मिली थी। अब, भारत को एक तरफ शेख हसीना को सुरक्षित आश्रय प्रदान करने की अपनी नैतिक और रणनीतिक जिम्मेदारी निभानी है, तो दूसरी तरफ बांग्लादेश की नई सत्ता संरचना के साथ व्यावहारिक संबंध स्थापित करने हैं। भारत का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि बांग्लादेश की धरती का इस्तेमाल भारत विरोधी तत्वों द्वारा न किया जा सके।
ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय और बांग्लादेशी समुदायों के लिए भी यह घटनाक्रम चिंता का विषय है। मेलबर्न और सिडनी जैसे शहरों में रहने वाले प्रवासी भारतीय न केवल अपने मूल देश की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं, बल्कि वे दक्षिण एशिया में बढ़ती कट्टरता और अस्थिरता को क्षेत्रीय शांति के लिए खतरा मानते हैं। ऑस्ट्रेलिया और भारत के बीच बढ़ती रणनीतिक साझेदारी के मद्देनजर, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता के लिए बांग्लादेश का शांत रहना अनिवार्य है। प्रवासी समुदाय को डर है कि यदि बांग्लादेश में राजनीतिक टकराव बढ़ता है, तो इसका असर सीधे तौर पर सीमा पार सुरक्षा और मानवीय स्थिति पर पड़ सकता है।
आने वाले महीनों में शेख हसीना की वापसी और बांग्लादेश में होने वाले चुनावों की रूपरेखा यह तय करेगी कि ढाका और दिल्ली के संबंध किस दिशा में जाएंगे। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह बांग्लादेश के लोगों की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं का समर्थन करते हुए अपने सुरक्षा हितों की रक्षा कैसे करता है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या 2026 तक बांग्लादेश में एक ऐसा वातावरण बन पाएगा जहां शेख हसीना की वापसी संभव हो सके, या फिर यह घोषणा केवल एक कूटनीतिक दबाव बनाने का जरिया बनकर रह जाएगी।
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