राजनीति
गाजियाबाद: दुष्कर्म पीड़िता को भर्ती करने से मना करने वाला अस्पताल एक साल से बिना पंजीकरण के चल रहा था
ICN24 Newsroom 9 अग॰ 2026, 07:37 am
गाजियाबाद में एक निजी अस्पताल की बड़ी लापरवाही सामने आई है। दुष्कर्म पीड़िता को इलाज न देने वाला यह अस्पताल एक साल से अवैध रूप से चल रहा था।
उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से एक हृदयविदारक और प्रशासनिक विफलता का मामला सामने आया है, जिसने भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था और निजी अस्पतालों की मनमानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हाल ही में एक नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता को इलाज देने से मना करने वाला निजी अस्पताल न केवल संवेदनहीन पाया गया, बल्कि जांच में यह भी खुलासा हुआ है कि वह पिछले एक साल से बिना किसी वैध पंजीकरण के संचालित हो रहा था। इस घटना ने एक बार फिर दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाओं की निगरानी पर सवालिया निशान लगा दिया है।
गाजियाबाद के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) ने इस मामले पर कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि किसी भी अस्पताल की यह प्राथमिक और कानूनी जिम्मेदारी है कि वह किसी भी आपातकालीन मरीज को तत्काल 'बेसिक लाइफ सपोर्ट' प्रदान करे। स्वास्थ्य विभाग के नियमों के अनुसार, अस्पताल प्रशासन मेडिको-लीगल (MLC) औपचारिकताओं या पुलिस हस्तक्षेप के बहाने मरीज के उपचार में देरी नहीं कर सकता। सर्वोच्च न्यायालय के पुराने आदेशों का हवाला देते हुए स्वास्थ्य विभाग ने दोहराया कि जीवन बचाना सर्वोपरि है और कानूनी प्रक्रियाएं उपचार के समानांतर चल सकती हैं, लेकिन वे उपचार का मार्ग नहीं रोक सकतीं।
जांच में पाया गया कि उक्त अस्पताल का पंजीकरण काफी समय पहले समाप्त हो चुका था और उसने नवीनीकरण के बिना ही अपनी सेवाएं जारी रखी थीं। यह न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि उन मरीजों की जान के साथ भी खिलवाड़ है जो भरोसे के साथ वहां पहुंचते हैं। जिला प्रशासन अब इस अस्पताल को सील करने और इसके मालिकों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने की प्रक्रिया में है। पीड़ित बच्ची के मामले में, अस्पताल ने कथित तौर पर पुलिस केस होने के डर से उसे भर्ती करने से मना कर दिया था, जिससे उसे दूसरे चिकित्सा केंद्र ले जाने में बहुमूल्य समय बर्बाद हुआ।
ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय के लिए इस तरह की खबरें अक्सर चिंता का विषय होती हैं। ऑस्ट्रेलिया की 'मेडिकेयर' और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में 'ड्यूटी ऑफ केयर' (उपचार का कर्तव्य) अत्यंत कठोरता से लागू की जाती है। वहां किसी भी सार्वजनिक या निजी अस्पताल के आपातकालीन विभाग में आए मरीज को प्राथमिकता के आधार पर स्थिर (stabilize) करना अनिवार्य होता है, चाहे वह मामला कानूनी हो या वित्तीय। भारत में निजी अस्पतालों द्वारा मेडिको-लीगल मामलों से बचने की प्रवृत्ति वहां की स्वास्थ्य सुरक्षा प्रणाली में एक बड़ी खामी को दर्शाती है, जिसे दुरुस्त करने की मांग समय-समय पर प्रवासी भारतीय भी उठाते रहे हैं।
यह घटना एक चेतावनी है कि केवल कागजी कार्रवाई पूरी करना ही अस्पतालों का काम नहीं है, बल्कि संकट की घड़ी में मानवता दिखाना उनका धर्म है। गाजियाबाद प्रशासन की इस कार्रवाई से अन्य अवैध अस्पतालों को कड़ा संदेश जाने की उम्मीद है। हालांकि, सवाल अब भी बना हुआ है कि एक साल तक बिना पंजीकरण के अस्पताल आखिर किसकी शह पर चलता रहा?
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