राजनीति
शून्य से शिखर और अब साख की लड़ाई: ममता बनर्जी ने क्यों छोड़ी थी कांग्रेस और कैसे खड़ा किया TMC का साम्राज्य?
ICN24 Newsroom 15 जून 2026, 05:31 am
पश्चिम बंगाल की राजनीति में आए हालिया भूचाल के बीच जानिए ममता बनर्जी के कांग्रेस छोड़ने के कारण और टीएमसी के भीतर बढ़ते विद्रोह का पूरा घटनाक्रम।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों जबरदस्त उथल-पुथल मची हुई है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर असंतोष की आग इस कदर भड़की है कि पार्टी के निर्वाचित प्रतिनिधियों ने ही बगावत का बिगुल फूंक दिया है। हालिया घटनाक्रम में पार्टी के 80 में से 60 विधायकों और 28 में से 20 लोकसभा सांसदों ने अलग होने का ऐलान कर दिया है। यह संकट न केवल ममता बनर्जी की साख के लिए चुनौती है, बल्कि पार्टी के भविष्य पर भी सवालिया निशान लगा रहा है।
इस संकट को समझने के लिए इतिहास के पन्नों को पलटना जरूरी है। ममता बनर्जी ने 1998 में अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की थी। उससे पहले वे कांग्रेस की एक कद्दावर युवा नेता थीं। कांग्रेस छोड़ने का मुख्य कारण तत्कालीन प्रदेश नेतृत्व के साथ उनके मतभेद और वामपंथी मोर्चे (Left Front) के खिलाफ कांग्रेस की कथित 'नरम' नीति थी। ममता का मानना था कि कांग्रेस बंगाल में वामपंथियों से लड़ने के बजाय उनके साथ समझौता कर रही है। इसी 'एकला चलो' की जिद ने TMC को जन्म दिया।
ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय, विशेषकर बंगाली प्रवासी, इन घटनाओं को बड़ी उत्सुकता से देख रहे हैं। सिडनी और मेलबर्न में सक्रिय बंगाली संगठनों के लिए बंगाल की स्थिरता निवेश और सांस्कृतिक संबंधों के लिहाज से महत्वपूर्ण है। टीएमसी के भीतर इस बड़े विभाजन का असर राज्य के प्रशासनिक ढांचे और विकास परियोजनाओं पर पड़ना तय है, जिससे प्रवासी भारतीयों के पैतृक जुड़ाव प्रभावित हो सकते हैं।
टीएमसी का सफर 'शून्य से शिखर' तक का रहा है। 2011 में 34 साल के वामपंथी शासन को उखाड़ फेंकने वाली ममता बनर्जी ने 'मां, माटी, मानुष' के नारे के साथ सत्ता संभाली थी। हालांकि, वर्तमान में भ्रष्टाचार के आरोप और संगठनात्मक कलह ने पार्टी को बैकफुट पर धकेल दिया है। विधायकों और सांसदों का इतनी बड़ी संख्या में बागी होना यह दर्शाता है कि पार्टी के भीतर संवाद की कमी और नेतृत्व के प्रति असंतोष गहरा चुका है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह ममता बनर्जी के राजनीतिक जीवन की सबसे कठिन परीक्षा है। जहां एक तरफ उन्हें अपनी सरकार बचानी है, वहीं दूसरी तरफ राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता के चेहरे के रूप में अपनी छवि को भी बरकरार रखना है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या 'दीदी' इस बगावत को शांत कर पाती हैं या बंगाल की राजनीति एक नए बदलाव की ओर अग्रसर है।
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