राजनीति
सड़क से संसद तक: क्या 21 साल की उम्र में चुनाव लड़ना सही है? रेवंत रेड्डी के प्रस्ताव ने छेड़ी नई बहस
ICN24 Newsroom 28 जुल॰ 2026, 01:37 am
तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने चुनाव लड़ने की न्यूनतम आयु 25 से घटाकर 21 वर्ष करने का प्रस्ताव रखा है, जिससे देश में युवाओं की राजनीतिक भागीदारी पर नई बहस शुरू हो गई है।
भारत की राजनीति में एक नए युग की आहट सुनाई दे रही है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी ने एक ऐसा प्रस्ताव पेश करने का निर्णय लिया है जिसने देशभर में चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है। मुख्यमंत्री रेड्डी ने घोषणा की है कि उनकी सरकार केंद्र की मोदी सरकार से विधानसभा और लोकसभा चुनाव लड़ने की न्यूनतम आयु 25 वर्ष से घटाकर 21 वर्ष करने का आग्रह करते हुए एक आधिकारिक प्रस्ताव पारित करेगी।
वर्तमान में भारतीय संविधान के अनुसार, संसद सदस्य (लोकसभा) या विधानसभा सदस्य बनने के लिए उम्मीदवार की आयु कम से कम 25 वर्ष होनी चाहिए। हालांकि, मतदान करने की आयु 18 वर्ष है। रेवंत रेड्डी का तर्क है कि यदि युवा 18 साल की उम्र में सरकार चुन सकते हैं, तो उन्हें 21 साल की उम्र में नेतृत्व करने का अवसर क्यों नहीं मिलना चाहिए? यह सवाल 'जेन जेड' (Gen Z) यानी आज की युवा पीढ़ी की क्षमताओं और उनकी राजनीतिक परिपक्वता पर केंद्रित है।
इस मुद्दे का प्रभाव केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि विदेशों में रह रहे भारतीय समुदाय, विशेषकर ऑस्ट्रेलिया में बसे प्रवासी भारतीयों (NRIs) के बीच भी इसकी गहरी गूंज है। ऑस्ट्रेलिया में संघीय चुनाव लड़ने की न्यूनतम आयु मात्र 18 वर्ष है। ऐसे में सिडनी, मेलबर्न और पर्थ जैसे शहरों में रहने वाले भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई युवा अक्सर यह सवाल उठाते हैं कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में युवाओं को मुख्यधारा की राजनीति में आने के लिए इतना लंबा इंतजार क्यों करना पड़ता है।
विशेषज्ञों का एक पक्ष इस प्रस्ताव का पुरजोर समर्थन कर रहा है। उनका कहना है कि भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में से एक है, जिसकी औसत आयु 28-29 वर्ष है। ऐसे में संसद में युवाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने से नई ऊर्जा, तकनीक के प्रति बेहतर समझ और आधुनिक समस्याओं के नवीन समाधान मिल सकेंगे। उनका तर्क है कि 'सड़क' पर विरोध प्रदर्शन करने वाले युवा अब 'संसद' के भीतर नीति-निर्माण में भागीदार बनने के योग्य हैं।
वहीं, आलोचकों का मानना है कि राजनीति में केवल जोश ही काफी नहीं, बल्कि प्रशासनिक अनुभव और जीवन की परिपक्वता भी आवश्यक है। उनका तर्क है कि 21 साल की उम्र में एक व्यक्ति अक्सर अपनी शिक्षा पूरी कर रहा होता है और बिना जमीनी अनुभव के विधायी कार्यों की जटिलताओं को समझना कठिन हो सकता है।
रेवंत रेड्डी के इस कदम को युवा मतदाताओं को लुभाने की एक बड़ी राजनीतिक चाल के रूप में भी देखा जा रहा है। यदि यह प्रस्ताव कानून बनता है, तो यह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होगा। फिलहाल, यह बहस जारी है कि क्या भारतीय 'जेन जेड' सदन की मर्यादाओं और देश के भविष्य की जिम्मेदारियों को संभालने के लिए तैयार है या नहीं।
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