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ज्येष्ठ पूर्णिमा 2026: तिथि, स्नान-दान का शुभ मुहूर्त और भद्रा का साया; जानें ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीयों के लिए जरूरी जानकारी

ICN24 Newsroom 21 जून 2026, 01:26 am
ज्येष्ठ पूर्णिमा 2026: तिथि, स्नान-दान का शुभ मुहूर्त और भद्रा का साया; जानें ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीयों के लिए जरूरी जानकारी

ज्येष्ठ पूर्णिमा 2026 की सही तिथि और मुहूर्त को लेकर उलझन दूर करें। जानें स्नान-दान का समय और भद्रा काल का प्रभाव।

सनातन धर्म में ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा का विशेष महत्व है। इसे न केवल धार्मिक दृष्टि से पवित्र माना जाता है, बल्कि इस दिन दान और स्नान करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। वर्ष 2026 में ज्येष्ठ पूर्णिमा की तिथि को लेकर कई लोगों में असमंजस की स्थिति बनी हुई है। हिंदू पंचांग के अनुसार, इस वर्ष ज्येष्ठ पूर्णिमा 31 मई, रविवार को मनाई जाएगी। पूर्णिमा तिथि का आरंभ 30 मई की शाम से ही हो जाएगा, लेकिन उदयातिथि के सिद्धांत के कारण मुख्य व्रत और अनुष्ठान 31 मई को ही संपन्न किए जाएंगे। ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय के लिए समय का अंतर एक महत्वपूर्ण कारक होता है। सिडनी, मेलबर्न और ब्रिस्बेन जैसे शहरों में रहने वाले श्रद्धालुओं को भारतीय समयानुसार (IST) गणना करते समय स्थानीय समय (AEST) का ध्यान रखना होगा। ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा का विधान है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने से पिछले जन्मों के पाप धुल जाते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है। इस वर्ष ज्येष्ठ पूर्णिमा पर भद्रा का साया भी रहने वाला है। ज्योतिष शास्त्र में भद्रा काल को शुभ कार्यों के लिए वर्जित माना गया है। 30 मई की रात से शुरू होकर भद्रा अगले दिन सुबह तक प्रभावी रहेगी। इसलिए, जो श्रद्धालु उपवास रखना चाहते हैं या सत्यनारायण कथा का आयोजन करना चाहते हैं, उन्हें भद्रा समाप्त होने के बाद ही पूजा शुरू करनी चाहिए। सिडनी और मेलबर्न में रहने वाले भक्तों को सलाह दी जाती है कि वे स्थानीय हिंदू पंचांग के अनुसार पूजा का समय निर्धारित करें, ताकि भद्रा दोष से बचा जा सके। ज्येष्ठ पूर्णिमा का एक और महत्वपूर्ण पहलू 'वट सावित्री व्रत' (पूर्णिमांत कैलेंडर के अनुसार) है। सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए वट वृक्ष की पूजा करती हैं। ऑस्ट्रेलिया में जहां वट वृक्ष सुलभ नहीं हैं, वहां महिलाएं प्रतीकात्मक रूप से या घर के भीतर छोटे पौधों के साथ इस परंपरा को निभाती हैं। इस दिन दान का भी विशेष महत्व है; विशेषकर जल, फल और वस्त्रों का दान अत्यधिक फलदायी माना जाता है। आध्यात्मिक लाभ के साथ-साथ यह दिन पर्यावरण के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का भी अवसर है। ज्येष्ठ मास की तपती गर्मी में जल संरक्षण और वृक्षारोपण जैसे कार्य इस पूर्णिमा की सार्थकता को बढ़ा देते हैं। प्रवासी भारतीयों के लिए इस तरह के त्योहार अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहने का एक सशक्त माध्यम हैं।
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