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भारतीय राजनीति में बढ़ती दलबदल की प्रवृत्ति: पार्टियों और नेताओं के बीच गहराता अविश्वास

ICN24 Newsroom 2 जुल॰ 2026, 12:31 pm
भारतीय राजनीति में बढ़ती दलबदल की प्रवृत्ति: पार्टियों और नेताओं के बीच गहराता अविश्वास

अर्घ्य सेनगुप्ता और स्वप्निल त्रिपाठी के विश्लेषण के अनुसार, शिवसेना, तृणमूल और आप जैसे दलों में बढ़ती दलबदल की घटनाओं ने भारतीय राजनीति में नेतृत्व और विचारधारा के संकट को गहरा कर दिया है।

भारत के राजनीतिक परिदृश्य में इन दिनों एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है, जहाँ राजनीतिक दलों और उनके नेताओं के बीच के पारंपरिक संबंध अब पहले जैसे मजबूत नहीं रहे। 'विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी' के पदाधिकारी अर्घ्य सेनगुप्ता और स्वप्निल त्रिपाठी के एक हालिया विश्लेषण के अनुसार, भारतीय राजनीति अब एक ऐसे दौर से गुजर रही है जहाँ पार्टी की विचारधारा और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के बीच निरंतर संघर्ष बना हुआ है। आंकड़ों के नजरिए से देखें तो यह स्थिति काफी चिंताजनक है। पिछले कुछ समय में शिवसेना के 6, तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 और आम आदमी पार्टी (AAP) के 7 लोकसभा एवं राज्यसभा सांसदों ने अपनी मूल पार्टी छोड़कर दूसरे दलों का दामन थाम लिया है। यह केवल एक दल की समस्या नहीं है, बल्कि यह देश के लोकतांत्रिक ढांचे में आ रहे एक बड़े बदलाव का संकेत है। ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए भी यह विषय अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत की राजनीतिक स्थिरता सीधे तौर पर अंतरराष्ट्रीय निवेश और प्रवासी नीतियों को प्रभावित करती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी और नेता के बीच इस खींचतान के पीछे कई कारण हैं। सबसे प्रमुख कारण 'आंतरिक लोकतंत्र' की कमी है। जब किसी दल के भीतर नेताओं को उनकी बात रखने का मौका नहीं मिलता या जब फैसले केवल शीर्ष नेतृत्व द्वारा थोपे जाते हैं, तो असंतोष पनपना स्वाभाविक है। इसके अलावा, सत्ता के समीकरण और चुनावी लाभ की राजनीति ने दलबदल को एक सामान्य प्रक्रिया बना दिया है। विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी के विशेषज्ञों के अनुसार, कानूनी तौर पर भी इस समस्या का समाधान ढूंढना चुनौतीपूर्ण रहा है। दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) के बावजूद, नेता कानून की खामियों का लाभ उठाकर अपनी निष्ठा बदलते रहते हैं। यह प्रवृत्ति न केवल मतदाताओं के भरोसे को तोड़ती है, बल्कि शासन की निरंतरता में भी बाधा उत्पन्न करती है। ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में, जहाँ संसदीय परंपराएं काफी व्यवस्थित हैं, भारतीय मूल के लोग अक्सर भारत में होने वाले इस राजनीतिक उलटफेर को हैरानी से देखते हैं। अंततः, राजनीतिक दलों को यह समझने की जरूरत है कि उनकी मजबूती केवल सत्ता में रहने से नहीं, बल्कि अपने कैडर और नेताओं के साथ मजबूत वैचारिक जुड़ाव से आती है। यदि भविष्य में भारतीय लोकतंत्र को और अधिक परिपक्व बनाना है, तो दलों को अपनी आंतरिक कार्यप्रणाली में सुधार करना होगा और नेताओं को भी अल्पकालिक लाभ के स्थान पर दीर्घकालिक लोक कल्याण को प्राथमिकता देनी होगी। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या भारतीय राजनीति का यह 'खींचतान का दौर' थम पाता है या यह दलबदल की संस्कृति और अधिक प्रभावी होगी।
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