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यूरोपीय संघ का बड़ा फैसला: अब सीमाओं के बाहर बनाए जाएंगे निर्वासन केंद्र, प्रवासियों पर सख्त हुआ रुख
ICN24 Newsroom 20 जून 2026, 09:08 am
यूरोपीय संघ ने प्रवासियों के निर्वासन के लिए बाहरी केंद्रों के इस्तेमाल की अनुमति दे दी है, जो ऑस्ट्रेलिया की पुरानी शरणार्थी नीतियों की याद दिलाता है।
यूरोपीय संघ (EU) ने अपनी प्रवासन और शरण नीति में एक ऐतिहासिक और विवादास्पद बदलाव करते हुए, सदस्य देशों को अनियमित प्रवासियों के लिए 'ऑफशोर निर्वासन केंद्र' स्थापित करने की अनुमति दे दी है। इस नए कानून के तहत, यूरोपीय संघ की सीमाओं में अवैध रूप से प्रवेश करने वाले प्रवासियों को अब वापस उनके मूल देश भेजने से पहले किसी तीसरे देश (गैर-यूरोपीय राष्ट्र) में स्थित केंद्रों में रखा जा सकेगा। यह निर्णय ब्रुसेल्स में आयोजित एक शिखर सम्मेलन के दौरान लिया गया, जहाँ यूरोपीय नेताओं ने महाद्वीप में बढ़ते प्रवासन दबाव को कम करने के तरीकों पर चर्चा की।
यह कदम यूरोपीय संघ की पुरानी उदार प्रवासन नीतियों से एक बड़े अलगाव का संकेत है। हाल के वर्षों में इटली, हंगरी और पोलैंड जैसे देशों में दक्षिणपंथी सरकारों के उभार और प्रवासन विरोधी भावनाओं के कारण यूरोपीय आयोग पर सख्त कार्रवाई का दबाव बढ़ रहा था। नई नीति का मुख्य उद्देश्य उन लोगों को हतोत्साहित करना है जो खतरनाक समुद्री रास्तों से यूरोप पहुंचने की कोशिश करते हैं। यूरोपीय संघ के अधिकारियों का तर्क है कि यदि प्रवासियों को पता होगा कि उन्हें सीधे यूरोप में प्रवेश के बजाय किसी तीसरे देश के शिविर में भेजा जाएगा, तो वे मानव तस्करों के जाल में फंसने से बचेंगे।
ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय के लिए यह खबर विशेष महत्व रखती है, क्योंकि यह नीति काफी हद तक ऑस्ट्रेलिया की विवादास्पद 'ऑफशोर प्रोसेसिंग' नीति (जैसे नौरू और मानुस द्वीप) से प्रेरित नजर आती है। ऑस्ट्रेलिया दशकों से अपनी सीमाओं की सुरक्षा के लिए इसी तरह के कठोर मॉडल का उपयोग करता रहा है। भारत से बड़ी संख्या में लोग हर साल बेहतर भविष्य की तलाश में यूरोप का रुख करते हैं। इस नए कानून के लागू होने के बाद, उन भारतीय प्रवासियों के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं जिनके पास वैध दस्तावेज नहीं हैं।
मानवाधिकार संगठनों ने इस कानून की कड़ी निंदा की है। एमनेस्टी इंटरनेशनल और अन्य एनजीओ का कहना है कि प्रवासियों को तीसरे देशों में भेजना उनके मानवाधिकारों का उल्लंघन है और इससे उन देशों में सुरक्षा और पारदर्शिता की कमी हो सकती है। आलोचकों का तर्क है कि लीबिया या अल्बानिया जैसे देशों में प्रवासियों की सुरक्षा की गारंटी देना मुश्किल होगा। संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (UNHCR) ने भी इस पर चिंता व्यक्त की है कि इस तरह के केंद्र शरण चाहने वालों की कानूनी प्रक्रियाओं में देरी करेंगे।
आने वाले महीनों में, यूरोपीय संघ यह तय करेगा कि किन देशों के साथ इन केंद्रों को बनाने के लिए समझौते किए जाएंगे। फिलहाल, इटली ने अल्बानिया के साथ एक द्विपक्षीय समझौता कर पहले ही इस मॉडल का परीक्षण शुरू कर दिया है। यह वैश्विक स्तर पर प्रवासन प्रबंधन के बदलते स्वरूप को दर्शाता है, जहाँ विकसित राष्ट्र अब 'बॉर्डर आउटसोर्सिंग' को एक समाधान के रूप में देख रहे हैं।
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