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वर्ल्ड कप: दोहरी पात्रता वाले खिलाड़ियों के सामने देश चुनने की कठिन चुनौती, प्रवासी समुदायों में बढ़ी चर्चा

ICN24 Newsroom 20 जून 2026, 03:37 am
वर्ल्ड कप: दोहरी पात्रता वाले खिलाड़ियों के सामने देश चुनने की कठिन चुनौती, प्रवासी समुदायों में बढ़ी चर्चा

विश्व कप के दौरान कई खिलाड़ी अपनी पहचान और राष्ट्रीय टीम के चुनाव को लेकर दुविधा में हैं। जानें कैसे दोहरी नागरिकता खेल के मैदान पर बड़े फैसले लेने को मजबूर करती है।

फुटबॉल विश्व कप के हर संस्करण में मैदान पर केवल खेल का कौशल ही नहीं, बल्कि पहचान और राष्ट्रीयता की एक गहरी कहानी भी दिखाई देती है। हाल के वर्षों में 'दोहरी पात्रता' (dual eligibility) वाले खिलाड़ियों की संख्या में भारी बढ़ोतरी हुई है, जिससे खिलाड़ियों के सामने यह कठिन सवाल खड़ा हो जाता है कि वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किस देश का प्रतिनिधित्व करें। जेनेवा में हालिया खेल चर्चाओं के दौरान यह मुद्दा प्रमुखता से उभरा है, जहां फ्लोरिडन बालोगन जैसे खिलाड़ियों के उदाहरण दिए गए हैं। अमेरिकी फॉरवर्ड फ्लोरिडन बालोगन की कहानी इस दुविधा का एक सटीक उदाहरण है। पैराग्वे के खिलाफ अमेरिका की हालिया जीत में दो गोल करने वाले बालोगन का जन्म न्यूयॉर्क में हुआ था, लेकिन उनका पालन-पोषण इंग्लैंड में हुआ और उनके माता-पिता नाइजीरियाई हैं। उनके पास इन तीनों में से किसी भी देश के लिए खेलने का विकल्प था। अंततः, उन्होंने अपनी जन्मभूमि अमेरिका को चुना, जिससे इंग्लैंड और नाइजीरिया दोनों की उम्मीदों को झटका लगा। यह केवल एक खिलाड़ी की कहानी नहीं है, बल्कि आज के वैश्विक खेल जगत की एक सामान्य वास्तविकता बन गई है। ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय (Indian-Australian community) के लिए यह विषय विशेष रूप से प्रासंगिक है। जिस तरह फुटबॉल में खिलाड़ी अपनी जड़ों और वर्तमान निवास के बीच संतुलन बनाते हैं, वैसी ही स्थिति ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट और अन्य खेलों में भी देखी जाती है। ऑस्ट्रेलिया में बढ़ रहे भारतीय मूल के युवा खिलाड़ी अक्सर इस सोच में रहते हैं कि क्या वे 'बैगी ग्रीन' (Baggy Green) पहनकर ऑस्ट्रेलिया का प्रतिनिधित्व करें या अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़कर भारत के लिए खेलें। गुरिंदर संधू और तनवीर सांघा जैसे उदाहरण दिखाते हैं कि कैसे खेल प्रतिभा प्रवासन (migration) के माध्यम से दो संस्कृतियों को जोड़ती है। फुटबॉल की नियामक संस्था फीफा (FIFA) के नियमों ने इस प्रक्रिया को थोड़ा सुगम बनाया है, लेकिन भावनात्मक फैसला अभी भी खिलाड़ी और उसके परिवार पर निर्भर करता है। कई बार खिलाड़ी उस देश को चुनते हैं जहां उन्हें खेलने के अधिक अवसर और बेहतर कोचिंग सुविधाएं मिलती हैं, जबकि कुछ अपनी जड़ों की ओर वापस जाने का निर्णय लेते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह चलन भविष्य में और बढ़ेगा। जैसे-जैसे दुनिया अधिक जुड़ी हुई हो रही है, खिलाड़ियों के लिए 'राष्ट्र' की परिभाषा भौगोलिक सीमाओं से परे भावनात्मक और पेशेवर संबंधों तक फैल रही है। भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई प्रशंसकों के लिए, यह देखना दिलचस्प होगा कि आगामी वर्षों में उनकी अपनी प्रतिभाएं किस देश के झंडे तले विश्व मंच पर अपनी चमक बिखेरती हैं।
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