राजनीति
कामकाजी माँ या पिता? UNFPA सर्वे में सामने आई लैंगिक असमानता की कड़वी सच्चाई, भारत समेत दुनिया की दोहरी सोच उजागर
ICN24 Newsroom 15 जुल॰ 2026, 01:31 pm

UNFPA के ताजा सर्वे ने कामकाजी महिलाओं और माताओं के प्रति वैश्विक समाज के दोहरे मापदंडों को उजागर किया है, जो भारतीय प्रवासियों के लिए भी एक बड़ी चुनौती है।
संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) की वर्ष 2026 की नवीनतम रिपोर्ट ने लैंगिक समानता के दावों के बीच एक कड़वी सच्चाई पेश की है। दुनिया के 73 देशों में एक लाख से अधिक लोगों पर किए गए इस व्यापक सर्वे में यह बात सामने आई है कि आज भी समाज कामकाजी माताओं और पिताओं को एक ही तराजू में नहीं तलता। सर्वे के नतीजे बताते हैं कि भले ही आधुनिकता का कितना भी ढिंढोरा पीटा जाए, लेकिन जब बात घर और करियर के बीच संतुलन की आती है, तो महिलाओं के प्रति समाज का नजरिया आज भी रूढ़िवादी बना हुआ है।
इस सर्वे में शामिल अधिकांश प्रतिभागियों ने कामकाजी माताओं की तुलना में कामकाजी पिताओं को अधिक प्राथमिकता दी। चौंकाने वाली बात यह है कि एक बड़ा वर्ग अब भी यह मानता है कि बच्चों की देखभाल की प्राथमिक जिम्मेदारी केवल मां की है, और यदि वह करियर को प्राथमिकता देती है, तो उसे एक 'अच्छी मां' के रूप में नहीं देखा जाता। इसके विपरीत, पुरुषों के लिए पेशेवर सफलता को उनके पितृत्व के आड़े नहीं आने दिया जाता। यह दोहरा मापदंड न केवल भारत में बल्कि दुनिया के कई विकसित देशों में भी गहराई से जड़ें जमाए हुए है।
रिपोर्ट के अनुसार, केवल कामकाजी स्थिति ही नहीं, बल्कि महिलाओं के निजी जीवन के निर्णयों पर भी समाज का प्रहार जारी है। सर्वे में पाया गया कि जो महिलाएं बच्चे नहीं चाहतीं या जो तलाक का विकल्प चुनती हैं, उन्हें समाज पुरुषों की तुलना में कहीं अधिक हीन भावना और आलोचना की दृष्टि से देखता है। पुरुषों के लिए तलाक या पितृत्व से दूरी को अक्सर परिस्थितियों का परिणाम माना जाता है, जबकि महिलाओं के लिए इसे चारित्रिक या नैतिक पतन से जोड़कर देखा जाता है।
ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय (Indian-Australian Community) के संदर्भ में यह रिपोर्ट और भी प्रासंगिक हो जाती है। भारतीय मूल की महिलाएं जो ऑस्ट्रेलिया जैसे पश्चिमी समाज में अपने करियर को ऊंचाइयों पर ले जा रही हैं, वे अक्सर 'दोहरी मार' झेलती हैं। एक तरफ उन्हें कार्यस्थल पर वैश्विक मानकों के अनुरूप खुद को साबित करना होता है, तो दूसरी तरफ घर के भीतर पारंपरिक भारतीय अपेक्षाओं का बोझ उन पर बना रहता है। सिडनी और मेलबर्न जैसे शहरों में काम करने वाली कई भारतीय महिलाओं का मानना है कि सामुदायिक आयोजनों में आज भी उनसे सबसे पहले उनके बच्चों और घर के बारे में पूछा जाता है, जबकि उनके पति की केवल पेशेवर उपलब्धियों पर चर्चा होती है।
UNFPA की इस रिपोर्ट ने नीति निर्माताओं के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। यह स्पष्ट है कि केवल कानून बनाने से समानता नहीं आएगी, बल्कि सामाजिक सोच में आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता है। जब तक समाज 'पालन-पोषण' को एक साझा जिम्मेदारी के रूप में नहीं स्वीकारेगा, तब तक कामकाजी महिलाएं इस अदृश्य दबाव और भेदभाव का शिकार होती रहेंगी। यह सर्वे वैश्विक समुदाय के लिए एक चेतावनी है कि लैंगिक समानता की राह अभी भी बहुत लंबी और कठिन है।
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