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डोनाल्ड ट्रंप के 'नए मध्य पूर्व' के सपने के सामने खड़ी हैं कठिन चुनौतियां; ईरान के साथ तनाव कूटनीति के लिए बड़ी परीक्षा

ICN24 Newsroom 1 जुल॰ 2026, 01:56 am
डोनाल्ड ट्रंप के 'नए मध्य पूर्व' के सपने के सामने खड़ी हैं कठिन चुनौतियां; ईरान के साथ तनाव कूटनीति के लिए बड़ी परीक्षा

मध्य पूर्व में शांति के डोनाल्ड ट्रंप के दावों के बीच हालिया हमलों ने अमेरिका और ईरान के बीच गहराते कूटनीतिक संकट को उजागर कर दिया है, जिसका असर वैश्विक सुरक्षा पर पड़ सकता है।

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति और आगामी चुनावी दौड़ में सक्रिय डोनाल्ड ट्रंप अक्सर यह दावा करते रहे हैं कि वे मध्य पूर्व में स्थायी शांति स्थापित कर सकते हैं। हालांकि, ज़मीनी हकीकत उनके इन दावों से कोसों दूर नज़र आती है। हाल के दिनों में ईरान और उसके सहयोगी समूहों द्वारा किए गए हमलों और जवाबी कार्रवाइयों ने स्पष्ट कर दिया है कि तेहरान और वाशिंगटन के बीच कूटनीतिक संवाद की सीमाएं समाप्त होती जा रही हैं। ट्रंप के 'नए मध्य पूर्व' की परिकल्पना, जिसमें 'अब्राहम अकॉर्ड्स' के माध्यम से अरब देशों और इजरायल के बीच सामान्य होते संबंधों पर ज़ोर दिया गया था, अब ईरान की आक्रामक नीतियों के कारण खतरे में पड़ती दिख रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप की 'अधिकतम दबाव' (Maximum Pressure) की नीति ने ईरान को अलग-थलग तो किया, लेकिन उसे अपनी परमाणु महत्वाकांक्षाओं या क्षेत्रीय हस्तक्षेप से पीछे हटने पर मजबूर नहीं कर सकी। वर्तमान में, ईरान न केवल सैन्य रूप से अधिक सक्रिय हुआ है, बल्कि उसने रूस और चीन जैसे देशों के साथ अपनी रणनीतिक निकटता भी बढ़ाई है। यह बदलाव ट्रंप की पुरानी कूटनीतिक योजनाओं के लिए एक बड़ी बाधा है। मध्य पूर्व में अस्थिरता का सीधा प्रभाव वैश्विक तेल बाज़ारों पर पड़ता है, जिससे भारत और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों की अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है। भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय के लिए यह घटनाक्रम विशेष महत्व रखता है। ऑस्ट्रेलिया अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए काफी हद तक वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर निर्भर है। वहीं, खाड़ी देशों में लाखों भारतीय प्रवासी काम करते हैं, और वहां किसी भी प्रकार का युद्ध या संघर्ष उनके जीवन और भारत को भेजे जाने वाले विदेशी धन (remittances) पर बुरा असर डाल सकता है। मेलबर्न और सिडनी में बसे भारतीय मूल के पेशेवरों के लिए, जो वैश्विक व्यापार और तकनीक से जुड़े हैं, मध्य पूर्व की यह अस्थिरता निवेश और बाज़ार की अनिश्चितता का कारण बन रही है। इसके अलावा, ऑस्ट्रेलिया और भारत दोनों ही 'क्वाड' (Quad) के सदस्य हैं और हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। यदि अमेरिका मध्य पूर्व के संकट में और अधिक उलझता है, तो हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उसकी उपस्थिति और संसाधनों के आवंटन पर सवाल उठ सकते हैं। ट्रंप का यह सोचना कि केवल व्यापारिक सौदों और दबाव से मध्य पूर्व की जटिल समस्याओं को सुलझाया जा सकता है, फिलहाल अपरिपक्व (premature) जान पड़ता है। वास्तविक शांति के लिए उन मूलभूत मुद्दों को हल करना आवश्यक होगा जो दशकों से इस क्षेत्र को अशांत किए हुए हैं।
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