राजनीति
TMC के मजबूत गढ़ में सेंध? बंगाल के 'सिंडिकेट राज' में दरार और अंदरूनी कलह के संकेत
ICN24 Newsroom 14 जून 2026, 08:01 pm

पश्चिम बंगाल की राजनीति में 'सिंडिकेट सिस्टम' एक बार फिर चर्चा में है। टीएमसी के गढ़ माने जाने वाले इलाकों में अंदरूनी कलह और नेटवर्क में दरार के संकेत मिल रहे हैं।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में दशकों से जड़े जमा चुका 'सिंडिकेट सिस्टम' एक बार फिर सुर्खियों में है। कभी वामपंथी शासन के दौरान शुरू हुआ यह तंत्र आज तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के सांगठनिक ढांचे का एक विवादास्पद हिस्सा माना जाता है। हालिया रिपोर्टों और राजनीतिक हलचलों से संकेत मिल रहे हैं कि टीएमसी के उन मजबूत गढ़ों में अब दरारें पड़ने लगी हैं, जहां कभी इस सिंडिकेट नेटवर्क का एकछत्र राज हुआ करता था।
राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, सिंडिकेट दरअसल निर्माण सामग्री की आपूर्ति और स्थानीय ठेकों पर नियंत्रण रखने वाला एक अनौपचारिक समूह है। वाम मोर्चे के शासन के अंतिम वर्षों में राजारहाट और न्यू टाउन जैसे क्षेत्रों के शहरीकरण के दौरान यह व्यवस्था पनपी थी। हालांकि, 2011 में सत्ता परिवर्तन के बाद, टीएमसी पर इस व्यवस्था को संस्थागत रूप देने के आरोप लगते रहे हैं। अब, पार्टी के भीतर बढ़ते असंतोष और स्थानीय नेताओं के बीच वर्चस्व की जंग ने इस 'मजबूत किले' की नींव हिला दी है।
पिछले कुछ महीनों में कोलकाता के बाहरी इलाकों और औद्योगिक क्षेत्रों में सिंडिकेट के सदस्यों के बीच हिंसक झड़पों की खबरें आई हैं। यह अंदरूनी कलह न केवल कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती बनी है, बल्कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के लिए भी सिरदर्द साबित हो रही है। जानकारों का मानना है कि संसाधन और अवैध उगाही के बंटवारे को लेकर उपजा यह विवाद अब सार्वजनिक होने लगा है, जो टीएमसी की 'क्लीन इमेज' बनाने की कोशिशों को धक्का पहुंचा सकता है।
ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय, विशेषकर पश्चिम बंगाल से ताल्लुक रखने वाले प्रवासियों के लिए यह खबर महत्वपूर्ण है। मेलबर्न और सिडनी जैसे शहरों में सक्रिय बंगाली डायस्पोरा अक्सर अपने गृह राज्य में निवेश और रियल एस्टेट संपत्तियों की सुरक्षा को लेकर चिंतित रहता है। सिंडिकेट नेटवर्क में अस्थिरता का सीधा असर राज्य के रियल एस्टेट सेक्टर और व्यापारिक माहौल पर पड़ता है, जिससे विदेशी निवेश और प्रवासियों के भरोसे पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है।
आगामी चुनावों को देखते हुए, भाजपा और वामपंथी दल इस मुद्दे को जोर-शोर से उठा रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि सिंडिकेट अब केवल व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह चुनावों के दौरान 'बाहुबल' का मुख्य स्रोत बन चुका है। यदि इस नेटवर्क में दरारें बढ़ती हैं, तो इसका सीधा असर टीएमसी की चुनावी मशीनरी पर पड़ सकता है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कई बार सार्वजनिक मंचों से पार्टी कार्यकर्ताओं को भ्रष्टाचार से दूर रहने की चेतावनी दी है, लेकिन जमीन पर स्थिति कुछ और ही कहानी बयां कर रही है।
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