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कंपनियों के दबाव में ग्रीन कार्ड नियमों पर नरम पड़ी सरकार: नई रिपोर्ट में खुलासा
ICN24 Newsroom 6 जून 2026, 06:00 pm

एक नई रिपोर्ट के अनुसार, व्यापारिक समूहों के कड़े विरोध के बाद सरकार ने ग्रीन कार्ड नियमों में नरमी बरती है, जिसका सीधा असर प्रवासी भारतीय पेशेवरों पर पड़ेगा।
एक हालिया खोजी रिपोर्ट में यह सनसनीखेज खुलासा हुआ है कि सरकार ने बड़े व्यापारिक समूहों और कॉर्पोरेट जगत के दबाव में आकर ग्रीन कार्ड नीतियों पर अपने रुख में नरमी बरती है। रिपोर्ट के अनुसार, शुरुआत में इन नियमों को अधिक सख्त बनाने और स्थानीय श्रमिकों को प्राथमिकता देने की योजना थी, लेकिन प्रमुख उद्योग घरानों के हस्तक्षेप के बाद प्रस्तावित सुधारों को काफी हद तक बदल दिया गया या उन्हें नरम कर दिया गया।
यह घटनाक्रम उन भारतीय पेशेवरों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है जो ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका जैसे देशों में स्थायी निवास (PR) या ग्रीन कार्ड की प्रतीक्षा कर रहे हैं। व्यापारिक समूहों का तर्क था कि नियमों में अधिक सख्ती से कौशल की कमी (Skill shortage) पैदा होगी और नवाचार की गति धीमी हो जाएगी। विशेष रूप से तकनीकी और स्वास्थ्य सेवा क्षेत्रों में कार्यरत कंपनियों ने चेतावनी दी थी कि कड़े नियमों से विदेशी प्रतिभाओं का पलायन हो सकता है, जिससे अंततः अर्थव्यवस्था को नुकसान होगा।
भारतीय समुदाय के लिए इसके दोहरे मायने हैं। एक ओर, नियमों में ढील का मतलब है कि कुशल आईटी पेशेवरों और इंजीनियरों के लिए कार्य वीजा और स्थायी निवास की राह कुछ आसान बनी रह सकती है। दूसरी ओर, आलोचकों का तर्क है कि 'कॉर्पोरेट लॉबिंग' के कारण होने वाले ये बदलाव नीतिगत स्पष्टता को प्रभावित करते हैं और अक्सर उन प्रवासियों के हितों को नजरअंदाज कर देते हैं जो वर्षों से कतार में खड़े हैं।
ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय मूल के प्रवासियों के लिए भी यह खबर प्रासंगिक है, क्योंकि वहां भी आव्रजन सुधारों और व्यापारिक आवश्यकताओं के बीच अक्सर खींचतान देखी जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकारें केवल कॉर्पोरेट लाभ के लिए नीतियां बदलती हैं, तो इससे सामाजिक संतुलन और प्रवासियों के दीर्घकालिक कल्याण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
फिलहाल, इस रिपोर्ट ने आव्रजन सुधारों की पारदर्शिता पर नई बहस छेड़ दी है। क्या भविष्य की आव्रजन नीतियां केवल आर्थिक आंकड़ों और कंपनियों की मांग पर आधारित होंगी, या उनमें मानवीय और सामाजिक पहलुओं को भी समान महत्व दिया जाएगा? यह एक ऐसा सवाल है जिसका उत्तर आने वाले महीनों में विधायी संशोधनों के दौरान मिलने की उम्मीद है। भारतीय समुदाय की नजर अब इस बात पर टिकी है कि क्या सरकार इन दबावों के बावजूद प्रवासियों के लिए एक न्यायपूर्ण और अनुमानित आव्रजन प्रणाली सुनिश्चित कर पाएगी।
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