राजनीति
धर्म परिवर्तन और आरक्षण: क्या दलित ईसाइयों और मुस्लिमों को मिलेगा अनुसूचित जाति का दर्जा? संवैधानिक बहस तेज़
ICN24 Newsroom 12 जून 2026, 02:00 am

धर्म परिवर्तन के आधार पर अनुसूचित जाति (SC) के लाभों से वंचित रखने की वैधानिकता पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है, जिससे सामाजिक न्याय पर नई बहस छिड़ गई है।
भारत में दशकों से चली आ रही एक जटिल कानूनी और संवैधानिक बहस ने एक बार फिर तूल पकड़ लिया है। मुद्दा यह है कि क्या उन दलितों को अनुसूचित जाति (SC) के दर्जे और आरक्षण के लाभों से वंचित रखा जा सकता है जिन्होंने ईसाई या इस्लाम धर्म अपना लिया है। वर्तमान में, 1950 का राष्ट्रपति आदेश केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म मानने वाले दलितों को ही अनुसूचित जाति के रूप में मान्यता देता है।
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर चल रही सुनवाई ने इस मूलभूत प्रश्न को पुनर्जीवित कर दिया है कि क्या जातिगत भेदभाव धर्म बदलने मात्र से समाप्त हो जाता है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि भारतीय समाज में 'छुआछूत' और सामाजिक पिछड़ापन एक ऐसी कड़वी सच्चाई है जो धर्म परिवर्तन के बाद भी व्यक्ति का पीछा नहीं छोड़ती। उनका कहना है कि यह भेदभाव केवल हिंदू धर्म तक सीमित नहीं है, बल्कि दक्षिण एशियाई सामाजिक संरचना के कारण अन्य धर्मों में भी प्रवेश कर चुका है।
केंद्र सरकार ने इस मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट करते हुए पहले भी तर्क दिया था कि अनुसूचित जाति का दर्जा उन समूहों के लिए आरक्षित है जिन्होंने ऐतिहासिक रूप से हिंदू धर्म के भीतर 'अस्पृश्यता' के दंश को झेला है। सरकार का मानना है कि ईसाई और इस्लाम जैसे धर्म समानता के सिद्धांत पर आधारित हैं, और वहां सैद्धांतिक रूप से जाति व्यवस्था का कोई स्थान नहीं है। हालांकि, आलोचकों का कहना है कि यह तर्क जमीनी हकीकत से मेल नहीं खाता, जहाँ 'दलित ईसाई' और 'पसमांदा मुस्लिम' आज भी सामाजिक हाशिए पर हैं।
इस बहस का महत्व केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में रह रहे भारतीय प्रवासियों के लिए भी यह प्रासंगिक है। हाल के वर्षों में ऑस्ट्रेलिया में भी जाति-आधारित भेदभाव के मामलों पर चर्चा हुई है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि पहचान के ये प्रश्न सीमाओं के पार भी बने रहते हैं। प्रवासी समुदाय के लिए यह समझना महत्वपूर्ण है कि भारत में आरक्षण और सामाजिक सुरक्षा के नियम किस प्रकार बदल रहे हैं।
वर्तमान में, पूर्व मुख्य न्यायाधीश के.जी. बालकृष्णन की अध्यक्षता में एक आयोग इस मुद्दे की जांच कर रहा है। आयोग इस बात का अध्ययन कर रहा है कि क्या धर्म परिवर्तन करने वाले दलितों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति में कोई वास्तविक सुधार आया है। इस आयोग की रिपोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का आगामी फैसला भारत के आरक्षण ढांचे और 'समानता के अधिकार' की परिभाषा को नए सिरे से तय कर सकता है।
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