राजनीति
ममता पर कांग्रेस का ‘डबल गेम’? दिल्ली में दोस्ती, बंगाल में सियासी टकराव
ICN24 Newsroom 10 जून 2026, 04:30 am

विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' की बैठक में सोनिया गांधी और ममता बनर्जी की नजदीकियों के बीच पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और टीएमसी के बीच तल्खी बरकरार है।
नई दिल्ली में विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' (INDIA) की हालिया बैठक से निकलकर आई एक तस्वीर ने भारतीय राजनीति में चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है। इस तस्वीर में तृणमूल कांग्रेस (TMC) प्रमुख ममता बनर्जी और कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी एक-दूसरे को गले लगाते हुए मुस्कुरा रही हैं। यह दृश्य राष्ट्रीय स्तर पर एकजुटता का संदेश देने की कोशिश है, लेकिन इसके पीछे की राजनीतिक हकीकत काफी जटिल नजर आती है। राजनीतिक विश्लेषक इसे कांग्रेस का 'डबल गेम' बता रहे हैं, जहां दिल्ली में दोस्ती और बंगाल में सियासी कुश्ती का दौर जारी है।
गठबंधन की इस बैठक में ममता बनर्जी और सोनिया गांधी के बीच दिखी केमिस्ट्री ने विपक्षी खेमे में नई ऊर्जा भरने का काम किया है। विशेष रूप से संसद के भीतर और बाहर केंद्र सरकार को घेरने के लिए दोनों दलों ने आपसी सहमति जताई है। ममता बनर्जी, जो अक्सर क्षेत्रीय स्वायत्तता और कांग्रेस के नेतृत्व पर सवाल उठाती रही हैं, उनका सोनिया गांधी के प्रति यह रुख सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। हालांकि, यह 'दोस्ती' कोलकाता पहुंचते ही धरातल पर गायब होती दिखती है।
पश्चिम बंगाल की जमीनी राजनीति में स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है। राज्य स्तर पर कांग्रेस की प्रदेश इकाई, विशेष रूप से अधीर रंजन चौधरी जैसे नेता, ममता सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। स्थानीय निकाय चुनावों और विभिन्न भ्रष्टाचार के मुद्दों पर कांग्रेस के कार्यकर्ता टीएमसी के साथ सीधे संघर्ष में हैं। बंगाल कांग्रेस का मानना है कि टीएमसी के साथ किसी भी प्रकार का समझौता राज्य में उनके अस्तित्व को खतरे में डाल सकता है। यही कारण है कि जहां दिल्ली में हाथ मिलाए जा रहे हैं, वहीं बंगाल के जिलों में दोनों दलों के कार्यकर्ता आमने-सामने हैं।
इस विरोधाभास का असर ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय पर भी पड़ता है, जो भारत की राजनीति पर पैनी नजर रखते हैं। सिडनी, मेलबर्न और पर्थ जैसे शहरों में बसे प्रवासी भारतीय, विशेष रूप से जो बंगाल से ताल्लुक रखते हैं, इस राजनीतिक घटनाक्रम को लेकर बंटे हुए हैं। उनके लिए यह समझना चुनौतीपूर्ण है कि एक ही गठबंधन के दो दल अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग मापदंड कैसे अपना सकते हैं। प्रवासी भारतीयों के बीच होने वाली चर्चाओं में अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या यह गठबंधन केवल चुनावी गणित तक सीमित है या इसका कोई साझा वैचारिक आधार भी है।
आगामी चुनावों को देखते हुए ममता बनर्जी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि कांग्रेस और टीएमसी के बीच सीटों का बंटवारा और समन्वय सही नहीं रहा, तो इसका सीधा फायदा भाजपा को मिल सकता है। फिलहाल, दिल्ली की तस्वीरों ने सुर्खियां तो बटोरी हैं, लेकिन बंगाल के कार्यकर्ताओं के दिल जीतने के लिए अभी लंबी दूरी तय करनी बाकी है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सोनिया गांधी का 'पर्सनल टच' बंगाल की कड़वाहट को कम करने में सफल होता है या नहीं।
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