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सीजेपी विरोध प्रदर्शन में हिंसा पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: सीजेआई सूर्यकांत ने पूछा- 'स्वतंत्र जांच क्यों नहीं होनी चाहिए?'
ICN24 Newsroom 28 जुल॰ 2026, 09:36 pm

सुप्रीम कोर्ट ने विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस हिंसा और महिलाओं व मीडियाकर्मियों पर हमलों के आरोपों पर चिंता जताते हुए स्वतंत्र जांच की आवश्यकता पर बल दिया है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ ने हाल ही में विरोध प्रदर्शनों के दौरान हुई पुलिस हिंसा के मामलों पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। 'सिटिजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस' (सीजेपी) द्वारा आयोजित एक विरोध प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा के संबंध में सुनवाई करते हुए सीजेआई ने तीखा सवाल किया कि इस पूरे मामले की एक स्वतंत्र जांच क्यों नहीं की जानी चाहिए। अदालत उन याचिकाओं पर विचार कर रही थी जिनमें पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों, वकीलों और मीडियाकर्मियों पर जानलेवा हमले और गंभीर दुर्व्यवहार के आरोप लगाए गए हैं।
सुनवाई के दौरान पीठ ने उन रिपोर्टों का संज्ञान लिया जिनमें प्रदर्शनकारियों को आई गंभीर चोटों, महिलाओं के साथ हुई बदसलूकी और मीडिया कवरेज को रोकने के लिए पत्रकारों पर किए गए हमलों का विवरण दिया गया था। याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि जब पुलिस स्वयं आरोपी हो, तो विभागीय जांच निष्पक्षता की गारंटी नहीं दे सकती। इसी तर्क को आगे बढ़ाते हुए सीजेआई सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन के गंभीर आरोपों के बीच पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए एक बाहरी और निष्पक्ष एजेंसी से जांच कराना आवश्यक प्रतीत होता है।
यह मामला न केवल भारत के भीतर बल्कि विदेशों में रह रहे भारतीय समुदाय के बीच भी चर्चा का विषय बना हुआ है। ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में रह रहे भारतीय मूल के लोग भारत में कानून के शासन और नागरिक स्वतंत्रता की स्थिति पर बारीकी से नजर रखते हैं। ऑस्ट्रेलिया में भारतीय-प्रवासी समुदायों के बीच अक्सर लोकतांत्रिक विरोध के अधिकार और पुलिस के आचरण को लेकर बहस होती रहती है। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी उन लोगों के लिए एक बड़ी उम्मीद बनकर उभरी है जो भारतीय न्यायपालिका को लोकतांत्रिक मूल्यों के अंतिम रक्षक के रूप में देखते हैं।
पीठ ने विशेष रूप से अधिवक्ताओं (वकीलों) और मीडिया के सदस्यों को निशाना बनाए जाने पर नाराजगी जाहिर की। अदालत ने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में प्रेस की स्वतंत्रता और कानूनी सहायता प्राप्त करने का अधिकार बुनियादी स्तंभ हैं। यदि इन स्तंभों पर ही हमला होता है, तो यह पूरे लोकतांत्रिक ढांचे के लिए खतरा है। सीजेआई ने इस बात पर जोर दिया कि केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखना ही पुलिस का काम नहीं है, बल्कि उन्हें यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि उनकी कार्रवाई कानून के दायरे में हो।
मामले के संदर्भ में, याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि कई घायल व्यक्तियों को समय पर चिकित्सा सहायता नहीं दी गई और पुलिस की कार्रवाई असंगत और अत्यधिक बल प्रयोग वाली थी। अदालत ने अब संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा है और स्वतंत्र जांच समिति के गठन की संभावनाओं पर विचार करने को कहा है। आने वाले हफ्तों में इस मामले की अगली सुनवाई भारत में पुलिस जवाबदेही और मानवाधिकारों के संरक्षण की दिशा में एक नया मील का पत्थर साबित हो सकती है।
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