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चाबहार बंदरगाह पर मंडराते संकट के बादल: क्या भारत सुरक्षित रख पाएगा अपना रणनीतिक व्यापार मार्ग?

ICN24 Newsroom 4 अग॰ 2026, 08:38 pm
चाबहार बंदरगाह पर मंडराते संकट के बादल: क्या भारत सुरक्षित रख पाएगा अपना रणनीतिक व्यापार मार्ग?

ईरान के चाबहार बंदरगाह में भारत का निवेश अब अमेरिकी प्रतिबंधों और पश्चिम एशिया के तनाव के कारण खतरे में है। जानें यह भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है।

ईरान के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित चाबहार बंदरगाह, जो दशकों से भारत की विदेश नीति और रणनीतिक स्वायत्तता का प्रतीक रहा है, आज एक बार फिर वैश्विक कूटनीति के कठिन चौराहे पर खड़ा है। भारत ने हाल ही में इस बंदरगाह के परिचालन के लिए ईरान के साथ 10 साल के दीर्घकालिक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, लेकिन इस महत्वाकांक्षी परियोजना के भविष्य पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। इसका मुख्य कारण पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव और अमेरिका द्वारा संभावित प्रतिबंधों की चेतावनी है। भारत के लिए चाबहार केवल एक बंदरगाह नहीं, बल्कि पाकिस्तान को दरकिनार कर अफगानिस्तान और मध्य एशियाई देशों तक पहुंचने का एक वैकल्पिक गलियारा है। नई दिल्ली ने इस परियोजना में करोड़ों डॉलर का निवेश किया है ताकि 'इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर' (INSTC) को सफल बनाया जा सके। हालांकि, अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण वाशिंगटन ने स्पष्ट कर दिया है कि ईरान के साथ व्यापारिक समझौते करने वाली संस्थाओं पर प्रतिबंधों का खतरा बना रहेगा। यह स्थिति भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती पेश करती है क्योंकि उसे एक तरफ अपने पुराने मित्र ईरान और दूसरी तरफ अपने रणनीतिक साझेदार अमेरिका के बीच संतुलन बनाना है। विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान में पश्चिम एशिया की स्थिति 2018 के मुकाबले कहीं अधिक जटिल है। इजरायल और ईरान के बीच प्रत्यक्ष और परोक्ष संघर्ष ने इस पूरे क्षेत्र की स्थिरता को हिला दिया है। ऐसी स्थिति में, भारत के लिए चाबहार के माध्यम से होने वाला व्यापार जोखिमों से भर गया है। यदि अमेरिका प्रतिबंधों में ढील नहीं देता है, तो भारतीय कंपनियों के लिए वहां निवेश करना और जहाजों का परिचालन करना बेहद मुश्किल हो जाएगा। इसके अलावा, रेड सी (लाल सागर) में जारी संकट ने भी समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए भी यह खबर विशेष महत्व रखती है। भारत-प्रशांत क्षेत्र में भारत की बढ़ती आर्थिक शक्ति और उसके व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा सीधे तौर पर वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित करती है। ऑस्ट्रेलिया और भारत के बीच बढ़ते रक्षा और व्यापारिक संबंधों के परिप्रेक्ष्य में, चाबहार जैसी परियोजनाओं की सफलता भारत की ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय प्रभाव के लिए महत्वपूर्ण है। सिडनी और मेलबर्न में स्थित व्यापार विश्लेषकों का मानना है कि यदि चाबहार परियोजना बाधित होती है, तो इसका असर मध्य एशिया में भारतीय वस्तुओं की पहुंच और प्रतिस्पर्धी कीमतों पर पड़ेगा। फिलहाल, भारत सरकार ने कूटनीतिक स्तर पर बातचीत जारी रखी है। विदेश मंत्रालय का तर्क है कि चाबहार परियोजना का उद्देश्य क्षेत्रीय शांति और विकास है, विशेष रूप से लैंडलॉक (स्थलरुद्ध) अफगानिस्तान की सहायता करना। हालांकि, बदलती भू-राजनीति और वाशिंगटन के कड़े रुख के बीच, यह देखना होगा कि प्रधानमंत्री मोदी का प्रशासन इस 'रणनीतिक संपत्ति' को कैसे सुरक्षित रख पाता है। क्या भारत अमेरिका को यह समझाने में सफल होगा कि चाबहार केवल एक व्यापारिक मार्ग नहीं, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता का एक स्तंभ है?
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