राजनीति
वैवाहिक दुष्कर्म के अपराधीकरण पर सुप्रीम कोर्ट में टली बहस: आखिर क्यों बंटा हुआ है भारत?
ICN24 Newsroom 1 जुल॰ 2026, 02:56 am
भारत में वैवाहिक दुष्कर्म को अपराध घोषित करने की याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं, जबकि केंद्र सरकार ने इसे विवाह की संस्था के लिए खतरा बताया है।
भारत में वैवाहिक दुष्कर्म (Marital Rape) को अपराध घोषित करने की मांग लंबे समय से कानूनी और सामाजिक गलियारों में गूंज रही है। जहां दुनिया के कई विकसित देशों, जिनमें ऑस्ट्रेलिया भी शामिल है, में वैवाहिक दुष्कर्म दशकों पहले एक दंडनीय अपराध बन चुका है, वहीं भारत में यह मुद्दा आज भी उच्चतम न्यायालय की चौखट पर न्याय का इंतजार कर रहा है। वर्तमान में, भारतीय न्याय संहिता (BNS), जो पहले भारतीय दंड संहिता (IPC) थी, की धारा 375 के तहत एक अपवाद मौजूद है। यह अपवाद एक पति को अपनी पत्नी के साथ उसकी सहमति के बिना यौन संबंध बनाने पर बलात्कार के आरोपों से सुरक्षा प्रदान करता है, बशर्ते पत्नी की उम्र 18 वर्ष से अधिक हो।
इस कानूनी प्रावधान को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई कई वर्षों से लंबित है। केंद्र सरकार ने इस मुद्दे पर एक स्पष्ट और रूढ़िवादी रुख अपनाया है। सरकार का तर्क है कि वैवाहिक दुष्कर्म को अपराध घोषित करने से 'विवाह की संस्था' अस्थिर हो सकती है और यह पतियों के खिलाफ दुरुपयोग का एक हथियार बन सकता है। सरकार के अनुसार, भारतीय समाज में विवाह को एक पवित्र संस्कार माना जाता है, और पश्चिमी देशों के कानूनों को सीधे तौर पर भारतीय संदर्भ में लागू नहीं किया जा सकता।
हालांकि, महिला अधिकार कार्यकर्ताओं और कानूनी विशेषज्ञों का तर्क इसके बिल्कुल विपरीत है। उनका कहना है कि विवाह का प्रमाण पत्र किसी भी पुरुष को अपनी पत्नी की शारीरिक स्वायत्तता (Bodily Autonomy) का उल्लंघन करने का लाइसेंस नहीं देता है। कार्यकर्ताओं का मानना है कि सहमति हर परिस्थिति में अनिवार्य होनी चाहिए, चाहे वह वैवाहिक संबंध ही क्यों न हो। दिल्ली उच्च न्यायालय में इस मामले पर विभाजित फैसला आने के बाद अब सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं।
भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय के लिए यह बहस विशेष रूप से प्रासंगिक है। ऑस्ट्रेलिया में 1980 के दशक से ही वैवाहिक दुष्कर्म को अपराध माना गया है और वहां की कानूनी प्रणाली सहमति (Consent) को सर्वोपरि मानती है। प्रवासी भारतीयों के लिए यह देखना दिलचस्प है कि कैसे उनकी मातृभूमि अपनी पारंपरिक मान्यताओं और आधुनिक मानवाधिकारों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है। भारत में कानून के इस बदलाव का सीधा असर महिलाओं की सुरक्षा और समानता के अधिकार पर पड़ेगा।
न्यायालय के सामने मुख्य चुनौती यह है कि क्या वह व्यक्तिगत अधिकारों को सामाजिक परंपराओं से ऊपर रखेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक कानून में यह 'अपवाद' बना रहेगा, तब तक घरेलू हिंसा के दायरे में यौन शोषण को पहचान मिलना मुश्किल होगा। आगामी महीनों में होने वाली सुनवाई न केवल भारत के कानूनी ढांचे को बल्कि देश की सामाजिक मानसिकता को भी नई दिशा दे सकती है।
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