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तुकाराम मुंढे की कार्रवाई: 'न्यूनतम प्रयास' या मुंबई की प्रशासनिक व्यवस्था में बड़ा बदलाव?

ICN24 Newsroom 16 अग॰ 2026, 03:37 pm
तुकाराम मुंढे की कार्रवाई: 'न्यूनतम प्रयास' या मुंबई की प्रशासनिक व्यवस्था में बड़ा बदलाव?

एफडीए आयुक्त तुकाराम मुंढे की सख्त कार्यशैली ने मुंबई में हलचल मचा दी है, लेकिन आलोचक इसे स्थायी समाधान के बजाय केवल बुनियादी कर्तव्यों की पूर्ति मान रहे हैं।

महाराष्ट्र के खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) के वर्तमान आयुक्त तुकाराम मुंढे एक बार फिर अपनी चिर-परिचित कार्यशैली के कारण सुर्खियों में हैं। मुंबई के प्रशासनिक गलियारों में जहाँ एक ओर उनके कड़े फैसलों का स्वागत हो रहा है, वहीं दूसरी ओर एक बड़ा तबका इसे केवल 'दिखावा' या 'न्यूनतम प्रयास' (bare minimum) करार दे रहा है। आलोचकों का तर्क है कि मुंढे जैसे अधिकारियों का आना-जाना शहर के लिए नया नहीं है, लेकिन उनके जाने के बाद व्यवस्था फिर उसी भ्रष्टाचार और अव्यवस्था के ढर्रे पर लौट आती है। तुकाराम मुंढे को उनकी 'नो-नॉनसेन्स' छवि के लिए जाना जाता है। एफडीए आयुक्त के रूप में उन्होंने मिलावटखोरों और अनैतिक व्यापार प्रथाओं के खिलाफ जो मोर्चा खोला है, उसने मुंबई की जनता के बीच उन्हें फिर से 'नायक' के रूप में स्थापित कर दिया है। हालांकि, जानकारों का कहना है कि किसी भी अधिकारी के लिए नियमों का पालन कराना उसका बुनियादी कर्तव्य है। इसे एक असाधारण उपलब्धि के रूप में देखना असल में भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था की उस विफलता को दर्शाता है जहाँ ईमानदारी को एक 'दुर्लभ गुण' मान लिया गया है। ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय (NRIs) के लिए भारत के प्रशासनिक सुधार हमेशा से दिलचस्पी का विषय रहे हैं। सिडनी और मेलबर्न में रहने वाले कई प्रवासी भारतीय, जो अक्सर भारत में व्यापार करने या निवेश करने की योजना बनाते हैं, मुंढे जैसे अधिकारियों को उम्मीद की किरण के रूप में देखते हैं। उनका मानना है कि यदि प्रशासन में पारदर्शिता और सख्ती हो, तो भारत में व्यापार करना और भी सुगम हो जाएगा। लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि एक व्यक्ति का प्रभाव अक्सर उसके कार्यकाल तक ही सीमित रहता है। मुंढे का करियर तबादलों और विवादों से भरा रहा है। नवी मुंबई नगर निगम हो या नागपुर और पुणे में उनका कार्यकाल, हर जगह उन्होंने जनहित में कड़े कदम उठाए, लेकिन राजनीतिक दबाव और व्यवस्थागत प्रतिरोध के कारण उन्हें बार-बार पद छोड़ना पड़ा। आलोचकों का मुख्य मुद्दा यही है कि व्यक्तिगत ईमानदारी संस्थागत सुधार का विकल्प नहीं हो सकती। जब तक पूरी व्यवस्था को तकनीक और जवाबदेही के साथ नहीं बदला जाता, तब तक एक अधिकारी की सख्ती केवल एक अस्थायी मरहम की तरह काम करेगी। फिलहाल, मुंबई एक बार फिर 'मुंढे प्रभाव' देख रही है। लेकिन सवाल वही है: क्या यह बदलाव स्थायी होगा? या फिर यह भी पिछली बार की तरह केवल एक अस्थायी तूफान है जिसके थमते ही भ्रष्टाचार का साम्राज्य फिर से खड़ा हो जाएगा? भारतीय समुदाय की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या भारत के प्रशासनिक ढांचे में कोई ऐसा मौलिक बदलाव आएगा जो किसी एक व्यक्ति की मौजूदगी पर निर्भर न हो।
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