राजनीति
क्या महिलाओं का शरीर सार्वजनिक संपत्ति है? एरियाना ग्रांडे और शरीर की स्वायत्तता पर छिड़ी बहस
ICN24 Newsroom 9 अग॰ 2026, 03:37 pm

पॉप स्टार एरियाना ग्रांडे के शरीर को लेकर सोशल मीडिया पर हो रही चर्चा ने एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है: क्या किसी की सेहत की चिंता करना वास्तव में उनके शरीर पर नियंत्रण पाने का एक तरीका है?
हाल ही में अमेरिकी पॉप स्टार एरियाना ग्रांडे के शारीरिक स्वास्थ्य को लेकर सोशल मीडिया पर एक लंबी बहस छिड़ गई है। प्रशंसकों और आलोचकों द्वारा उनके 'दुबलेपन' पर जताई गई चिंता ने इस पुराने सवाल को फिर से जीवित कर दिया है कि आखिर एक महिला के शरीर पर किसका नियंत्रण है? ग्रांडे ने इस स्थिति पर प्रतिक्रिया देते हुए स्पष्ट किया कि जिस शरीर को लोग उनके 'पुराने और स्वस्थ' रूप से तुलना कर रहे हैं, वह वास्तव में उनके जीवन का सबसे अस्वस्थ दौर था।
यह मामला केवल हॉलीवुड तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस वैश्विक प्रवृत्ति को दर्शाता है जहां महिलाओं के शरीर को सार्वजनिक चर्चा का विषय मान लिया जाता है। अक्सर 'चिंता' की आड़ में महिलाओं के वजन, रंग और रूप-रंग पर टिप्पणी की जाती है। पत्रकारिता और सामाजिक मानकों के नजरिए से देखें तो इसे 'बॉडी पुलिसिंग' यानी शरीर की निगरानी करना कहा जाता है। इसमें व्यक्ति की निजता और उसकी पसंद को नजरअंदाज कर दिया जाता है।
ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय के संदर्भ में यह मुद्दा और भी प्रासंगिक हो जाता है। दक्षिण एशियाई संस्कृति में अक्सर पारिवारिक समारोहों या सामुदायिक आयोजनों में वजन को लेकर की जाने वाली टिप्पणियां 'स्नेह' या 'देखभाल' के रूप में पेश की जाती हैं। 'तुम बहुत कमजोर लग रही हो' या 'तुमने थोड़ा वजन बढ़ा लिया है' जैसे जुमले भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई परिवारों में आम हैं। हालांकि ये बातें अक्सर बिना किसी दुर्भावना के कही जाती हैं, लेकिन ये महिलाओं पर एक निश्चित शारीरिक मानक को बनाए रखने का मानसिक दबाव बनाती हैं।
मनोवैज्ञानिकों का तर्क है कि जब समाज स्वास्थ्य के नाम पर किसी के शरीर की आलोचना करता है, तो वह वास्तव में उस व्यक्ति की शारीरिक स्वायत्तता (Bodily Autonomy) का उल्लंघन कर रहा होता है। स्वास्थ्य का पैमाना केवल वह नहीं है जो बाहर से दिखाई देता है। एरियाना ग्रांडे के मामले ने यह साबित किया है कि जिसे दुनिया 'स्वस्थ' मान रही थी, वह वास्तव में उनके मानसिक और शारीरिक संघर्ष का दौर था।
अंततः, यह चर्चा हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम वास्तव में किसी की भलाई चाहते हैं या हम केवल अपनी सौंदर्य संबंधी धारणाओं को दूसरों पर थोप रहे हैं। भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई प्रवासियों के लिए, यह अपनी अगली पीढ़ी को यह सिखाने का अवसर है कि किसी के शरीर पर टिप्पणी करना केवल एक सामाजिक शिष्टाचार का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह मानवाधिकारों और व्यक्तिगत गरिमा से जुड़ा विषय है। महिलाओं को यह अधिकार होना चाहिए कि वे अपने शरीर के बारे में स्वयं निर्णय लें, बिना किसी बाहरी दबाव या 'चिंता' के मुखौटे वाली आलोचना के।
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