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अवैध हिरासत पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का सख्त फैसला: दोषी अधिकारियों के वेतन से कटेगी ₹25,000 प्रतिदिन की राशि
ICN24 Newsroom 10 जून 2026, 06:00 pm

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अब 24 घंटे से अधिक अवैध हिरासत पर दोषी अधिकारियों को हर्जाना देना होगा।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भारत में नागरिक अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा की दिशा में एक ऐतिहासिक मिसाल कायम की है। अदालत ने आदेश दिया है कि यदि किसी व्यक्ति को 24 घंटे से अधिक समय तक अवैध रूप से हिरासत में रखा जाता है, तो संबंधित पुलिस अधिकारियों और मजिस्ट्रेटों के वेतन से 25,000 रुपये प्रतिदिन की कटौती की जाएगी। यह राशि पीड़ित व्यक्ति को मुआवजे के रूप में दी जाएगी।
न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर की पीठ ने एक बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका पर सुनवाई करते हुए यह कड़ा रुख अपनाया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार सर्वोपरि है और किसी भी प्रशासनिक लापरवाही या मनमानी के कारण इसे छीना नहीं जा सकता। अदालत ने पाया कि कई मामलों में पुलिस और मजिस्ट्रेट कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करने में विफल रहते हैं, जिससे नागरिकों को अनावश्यक रूप से सलाखों के पीछे रहना पड़ता है।
उच्च न्यायालय ने नए दिशा-निर्देश जारी करते हुए कहा कि मुआवजे की यह राशि सीधे तौर पर उन अधिकारियों की जेब से जाएगी जो इस अवैध कृत्य के लिए जिम्मेदार पाए जाएंगे। कोर्ट का मानना है कि सरकारी खजाने पर बोझ डालने के बजाय व्यक्तिगत जवाबदेही तय करना अधिक प्रभावी होगा। इससे कानून प्रवर्तन एजेंसियों में अनुशासन आएगा और शक्तियों के दुरुपयोग पर लगाम लगेगी।
यह फैसला केवल उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि पूरे भारत के न्यायिक परिदृश्य में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेष रूप से विदेशों में रहने वाले भारतीय समुदाय (प्रवासी भारतीयों) के लिए यह खबर राहत भरी है, क्योंकि वे अक्सर भारत में अपने परिजनों के कानूनी अधिकारों को लेकर चिंतित रहते हैं। ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय मूल के लोग, जो भारत में कानूनी सुधारों पर बारीकी से नजर रखते हैं, इस फैसले को पारदर्शिता और मानवाधिकारों की जीत के रूप में देख रहे हैं।
अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि मजिस्ट्रेटों को रिमांड आदेश देते समय अधिक सतर्क रहना चाहिए। बिना ठोस आधार के किसी की स्वतंत्रता को बाधित करना अब अधिकारियों के लिए न केवल विभागीय जांच का विषय होगा, बल्कि आर्थिक रूप से भी भारी पड़ेगा। इस आदेश का उद्देश्य कानून व्यवस्था में जनता के विश्वास को बहाल करना और यह सुनिश्चित करना है कि 'गिरफ्तारी' का उपयोग उत्पीड़न के उपकरण के रूप में न किया जाए।
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