राजनीति
‘मेरा क्या कसूर था?’: भारत में पेपर लीक की भेंट चढ़ते छात्र और टूटते परिवारों की दास्तां
ICN24 Newsroom 3 अग॰ 2026, 11:37 am
भारत में नीट (NEET) पेपर लीक और प्रतियोगी परीक्षाओं में बढ़ती धांधली ने न केवल शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि सैकड़ों परिवारों को जीवन भर का गम दे दिया है।
भारत में राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET) के हालिया पेपर लीक मामले ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। यह विवाद केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने उन हज़ारों छात्रों के भविष्य और मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रहार किया है, जो वर्षों तक कड़ी मेहनत करते हैं। 'बीबीसी' और 'द हिंदू' जैसी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, भारत में पिछले एक दशक में छात्र आत्महत्याओं के मामलों में 80% की भयावह वृद्धि हुई है। हर साल परीक्षा में विफलता या भविष्य की अनिश्चितता के कारण 2,000 से अधिक छात्र अपनी जीवन लीला समाप्त कर लेते हैं।
हालिया विरोध प्रदर्शनों के बीच दिल को दहला देने वाली कहानियां सामने आ रही हैं। एक पिता ने अपनी व्यथा साझा करते हुए बताया कि उनके बेटे का गिटार आज भी कमरे के कोने में उसका इंतज़ार कर रहा है, लेकिन वह छात्र अब इस दुनिया में नहीं है। पेपर लीक और धांधली के कारण परीक्षा रद्द होने या देरी होने से छात्रों में गहरी हताशा (frustration) पैदा हो रही है। जब सालों की तपस्या के बाद एक छात्र को पता चलता है कि सिस्टम की कमियों के कारण उसका करियर दांव पर है, तो वह 'मेरा क्या कसूर था?' जैसे अनुत्तरित सवालों के साथ टूट जाता है।
आंकड़ों की बात करें तो नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के हवाले से बताया गया है कि भारत में छात्र आत्महत्या की दर आबादी की वृद्धि दर से भी तेज़ है। यह स्थिति भारत की शिक्षा प्रणाली में मौजूद 'प्रेशर कुकर' संस्कृति को उजागर करती है, जहाँ केवल अंक ही सफलता का एकमात्र मापदंड माने जाते हैं। पेपर लीक जैसी घटनाओं ने इस दबाव को कई गुना बढ़ा दिया है। राजनीतिक स्तर पर सरकार और विपक्ष के बीच खींचतान जारी है, लेकिन मुआवजे की घोषणाएं क्या उन पिताओं और माताओं के दुख को कम कर पाएंगी जिन्होंने अपने बच्चों को खोया है?
ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय (Indian-Australian Community) के लिए भी यह खबर चिंता का विषय है। यहाँ रहने वाले कई प्रवासी भारतीय अपने बच्चों की उच्च शिक्षा के लिए भारत के कोचिंग हब्स जैसे कोटा (Kota) पर भरोसा करते थे या खुद इसी प्रतिस्पर्धी माहौल से निकलकर आए हैं। मेलबर्न और सिडनी में रहने वाले भारतीय परिवारों का मानना है कि शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता की कमी और मानसिक स्वास्थ्य सहायता का अभाव एक राष्ट्रीय संकट बन चुका है।
विशेषज्ञों का कहना है कि केवल जांच समितियां बनाना काफी नहीं है। जब तक पेपर लीक के पीछे सक्रिय माफियाओं पर नकेल नहीं कसी जाएगी और छात्रों को परीक्षाओं से इतर जीवन की अहमियत नहीं सिखाई जाएगी, तब तक यह त्रासदी जारी रहेगी। भारत की प्रतियोगी परीक्षाओं का ढांचा अब सुधार की नहीं, बल्कि आमूल-चूल परिवर्तन की मांग कर रहा है ताकि फिर किसी छात्र को अपनी जान देकर सिस्टम की विफलता की कीमत न चुकानी पड़े।
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