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ट्रंप प्रशासन को बड़ा झटका: कोर्ट ने H-1B वीजा पर प्रस्तावित $100,000 की फीस को किया रद्द
ICN24 Newsroom 9 जून 2026, 09:00 am
अमेरिकी संघीय अदालत ने ट्रंप प्रशासन द्वारा H-1B वीजा फीस में भारी बढ़ोतरी के प्रस्ताव को अवैध घोषित करते हुए रद्द कर दिया है।
एक महत्वपूर्ण कानूनी फैसले में, अमेरिकी संघीय अदालत ने नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस विवादास्पद प्रस्ताव को खारिज कर दिया है, जिसमें H-1B वीजा की फीस को बढ़ाकर 100,000 डॉलर (लगभग 84 लाख रुपये) करने की योजना थी। न्यायाधीश ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि यह नीति राष्ट्रपति के अधिकार क्षेत्र से बाहर थी और संघीय कानूनों का उल्लंघन करती थी। यह निर्णय उन हजारों भारतीय पेशेवरों और तकनीकी विशेषज्ञों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है जो अमेरिका में काम करने का सपना देखते हैं या वहां कार्यरत हैं।
H-1B वीजा मुख्य रूप से भारतीय आईटी पेशेवरों के बीच बेहद लोकप्रिय है, क्योंकि यह अमेरिकी कंपनियों को विशिष्ट तकनीकी ज्ञान वाले विदेशी श्रमिकों को नियुक्त करने की अनुमति देता है। ट्रंप प्रशासन का तर्क था कि फीस में इस भारी वृद्धि से स्थानीय अमेरिकी श्रमिकों के हितों की रक्षा होगी और कंपनियों को विदेशी कर्मचारियों के बजाय घरेलू प्रतिभाओं को प्राथमिकता देने के लिए मजबूर किया जाएगा। हालांकि, उद्योग विशेषज्ञों और कानूनी जानकारों ने इसे 'प्रतिभा पर टैक्स' करार दिया था।
अदालत ने पाया कि इतनी बड़ी राशि वसूलना प्रशासनिक प्रक्रियाओं के मानदंडों के खिलाफ है। न्यायाधीश ने उल्लेख किया कि प्रशासन के पास इस तरह के वित्तीय बोझ को थोपने के लिए आवश्यक विधायी समर्थन नहीं था। इस फैसले से न केवल तकनीकी कंपनियों को आर्थिक राहत मिली है, बल्कि यह उन परिवारों के लिए भी सुकून की खबर है जो अनिश्चितता के दौर से गुजर रहे थे।
ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय के लिए भी यह खबर मायने रखती है। वैश्विक स्तर पर आव्रजन नीतियों का एक 'डोमिनो इफेक्ट' होता है। ऑस्ट्रेलिया में भी कुशल प्रवासन और वीजा सुधारों को लेकर अक्सर बहस होती रहती है। अमेरिका में इस तरह की सख्त नीतियों की विफलता यह संकेत देती है कि आर्थिक विकास के लिए वैश्विक प्रतिभा का स्वतंत्र प्रवाह आवश्यक है। सिडनी और मेलबर्न में स्थित कई भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई परामर्शदाता फर्मों का मानना है कि इस फैसले से वैश्विक जॉब मार्केट में स्थिरता आएगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह फीस लागू हो जाती, तो छोटी और मध्यम स्तर की कंपनियों के लिए भारतीय इंजीनियरों को प्रायोजित करना लगभग असंभव हो जाता। इससे न केवल इनोवेशन की रफ्तार धीमी होती, बल्कि अमेरिका की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता। फिलहाल, इस अदालती आदेश ने आव्रजन सुधारों की आड़ में लगाए जा रहे अत्यधिक वित्तीय प्रतिबंधों पर लगाम लगा दी है।
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