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ट्रंप प्रशासन का $100,000 H-1B वीजा शुल्क 'अवैध' घोषित, अमेरिकी अदालत ने नियम को किया रद्द

ICN24 Newsroom 9 जून 2026, 07:31 am
ट्रंप प्रशासन का $100,000 H-1B वीजा शुल्क 'अवैध' घोषित, अमेरिकी अदालत ने नियम को किया रद्द

अमेरिकी संघीय अदालत ने पूर्व ट्रंप प्रशासन द्वारा प्रस्तावित H-1B वीजा के भारी-भरकम शुल्क को अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया है, जिससे भारतीय पेशेवरों को बड़ी राहत मिली है।

अमेरिका की एक संघीय अदालत ने पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल के दौरान प्रस्तावित उस विवादास्पद नियम को रद्द कर दिया है, जिसके तहत H-1B वीजा के लिए 100,000 डॉलर (लगभग 84 लाख रुपये) का भारी शुल्क वसूलने की योजना थी। अदालत ने इस कदम को 'अवैध' और अधिकार क्षेत्र से बाहर बताते हुए स्पष्ट किया कि इसे एक वैध प्रशासनिक प्रक्रिया के बजाय एक दंडात्मक कर के रूप में देखा जाना चाहिए। यह फैसला उन हजारों कुशल विदेशी पेशेवरों, विशेष रूप से भारतीय इंजीनियरों और आईटी विशेषज्ञों के लिए एक बड़ी जीत माना जा रहा है, जो अमेरिकी तकनीकी क्षेत्र की रीढ़ हैं। मामले की सुनवाई करते हुए न्यायाधीश ने कहा कि प्रशासन के पास इस तरह का अत्यधिक शुल्क लगाने का कोई कानूनी आधार नहीं था। अदालत के अनुसार, आव्रजन नियमों में बदलाव करते समय सरकार को निर्धारित कानूनी सीमाओं का पालन करना अनिवार्य है। ट्रंप प्रशासन का तर्क था कि यह शुल्क स्थानीय अमेरिकी कामगारों के हितों की रक्षा करने और कंपनियों को विदेशी श्रम पर निर्भरता कम करने के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से लगाया गया था। हालांकि, उद्योग विशेषज्ञों और कानूनी जानकारों ने इसे हमेशा एक बाधा के रूप में देखा जो नवाचार और वैश्विक प्रतिभा के प्रवाह को रोकने के लिए तैयार किया गया था। भारतीय समुदाय के लिए इस फैसले के गहरे मायने हैं। H-1B वीजा कार्यक्रम का सबसे बड़ा लाभार्थी भारत रहा है। हर साल जारी होने वाले कुल H-1B वीजा का एक बड़ा हिस्सा भारतीय नागरिकों को मिलता है। यदि यह शुल्क लागू हो जाता, तो कई मध्यम और छोटी कंपनियों के लिए भारतीय प्रतिभाओं को नियुक्त करना आर्थिक रूप से असंभव हो जाता। इससे न केवल अमेरिका में रह रहे भारतीयों का भविष्य अधर में लटक जाता, बल्कि नई नियुक्तियों पर भी पूर्ण विराम लग जाता। ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए भी यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण है। हाल के वर्षों में 'ग्लोबल मोबिलिटी' के बढ़ते चलन के कारण कई भारतीय पेशेवर ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के बीच शिफ्ट होते रहते हैं। अमेरिका की आव्रजन नीतियों में आने वाली स्थिरता वैश्विक स्तर पर पेशेवरों के विश्वास को बढ़ाती है। सिडनी और मेलबर्न स्थित कई आव्रजन सलाहकारों का मानना है कि इस तरह के अदालती हस्तक्षेप से यह स्पष्ट होता है कि मनमाने प्रशासनिक फैसलों को लोकतांत्रिक संस्थाओं द्वारा चुनौती दी जा सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला न केवल वर्तमान आवेदकों को सुरक्षा प्रदान करता है, बल्कि भविष्य की सरकारों के लिए भी एक मिसाल कायम करता है कि वे आव्रजन शुल्कों का उपयोग आर्थिक हथकंडे के रूप में नहीं कर सकते। फिलहाल, बाइडेन प्रशासन ने इस फैसले पर कोई कड़ी प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन आव्रजन अधिवक्ताओं ने इसे न्याय की जीत बताया है। यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर प्रतिभाओं को आकर्षित करने के लिए देशों के बीच होड़ मची है, और अमेरिका अपनी इस प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त को खोना नहीं चाहेगा।
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