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तविषा शर्मा मामला: क्या 'संरक्षण का मिथक' महिलाओं की सुरक्षा में बाधक है?

ICN24 Newsroom 9 जुल॰ 2026, 01:31 pm
तविषा शर्मा मामला: क्या 'संरक्षण का मिथक' महिलाओं की सुरक्षा में बाधक है?

तविषा शर्मा की दुखद मृत्यु ने भारतीय समाज में जाति और पितृसत्ता के जटिल गठजोड़ पर एक नई बहस छेड़ दी है, जो सुरक्षा के दावों पर सवाल उठाती है।

तविषा शर्मा की हालिया मृत्यु ने न केवल एक परिवार को झकझोर कर रख दिया है, बल्कि इसने भारतीय समाज में महिलाओं की सुरक्षा और सामाजिक ढांचे पर गंभीर सवाल भी खड़े कर दिए हैं। यह मामला उस विचार को चुनौती देता है जिसे समाजशास्त्री 'संरक्षण का मिथक' कहते हैं—एक ऐसा विश्वास कि पारंपरिक और उच्च-वर्गीय ढांचों के भीतर महिलाएं सुरक्षित हैं। तविषा शर्मा, जो एक संपन्न और कथित तौर पर 'विशेषाधिकार प्राप्त' पृष्ठभूमि से आती थीं, की मौत के बाद मुख्यधारा के मीडिया और सोशल मीडिया पर व्यापक प्रतिक्रिया देखी गई। हालांकि, विशेषज्ञों का तर्क है कि यह मामला केवल व्यक्तिगत हिंसा का नहीं है, बल्कि यह उस 'ब्राह्मणवादी पितृसत्ता' (Brahmanical Patriarchy) के गहरे पहलुओं को उजागर करता है, जहां महिलाओं की स्वतंत्रता को 'सुरक्षा' के नाम पर नियंत्रित किया जाता है। जब यह कथित सुरक्षा कवच विफल हो जाता है, तब हिंसा की वास्तविकता सामने आती है। इस मामले ने एक और कड़वी सच्चाई की ओर इशारा किया है: हिंसा की दृश्यता। भारत में हर दिन अनगिनत महिलाएं हिंसा का शिकार होती हैं, लेकिन उनमें से केवल कुछ ही मामले राष्ट्रीय विलाप का विषय बनते हैं। दलित, बहुजन और आदिवासी समुदायों की महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा अक्सर समाचारों के हाशिए पर ही सिमट कर रह जाती है। तविषा के मामले में मिली त्वरित प्रतिक्रिया यह सोचने पर मजबूर करती है कि हमारा समाज किन महिलाओं को 'पीड़ित' के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार है और किन्हें अनदेखा कर देता है। ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए भी यह विमर्श अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रवासी भारतीयों के बीच भी अक्सर पारंपरिक मूल्यों और 'पारिवारिक सम्मान' (Izzat) की आड़ में घरेलू हिंसा को दबाने का प्रयास किया जाता है। यहाँ भी, एक 'आदर्श परिवार' की छवि बनाए रखने का दबाव महिलाओं को मदद मांगने से रोकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक समाज हिंसा को केवल एक व्यक्तिगत कृत्य मानता रहेगा और इसके पीछे के संरचनात्मक कारणों—जैसे जाति और पितृसत्ता—को नजरअंदाज करेगा, तब तक वास्तविक सुरक्षा एक सपना ही बनी रहेगी। ICN24 से बात करते हुए सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कहा कि तविषा शर्मा का मामला हमें यह याद दिलाता है कि शिक्षा या आर्थिक संपन्नता अकेले हिंसा से सुरक्षा की गारंटी नहीं है। असली बदलाव तभी संभव है जब हम उस व्यवस्था को चुनौती दें जो महिलाओं की स्वायत्तता पर नियंत्रण को ही सुरक्षा का पर्याय मानती है। यह समय केवल शोक मनाने का नहीं, बल्कि उन गहरी जड़ों को पहचानने का है जो इस प्रकार की हिंसा को खाद-पानी देती हैं।
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