राजनीति
सत्ता का अंतिम पड़ाव 'कुर्सी': वरिष्ठ विचारक सुधीश पचौरी ने राजनीति के बदलते स्वरूप पर रखे बेबाक विचार
ICN24 Newsroom 7 जून 2026, 11:00 am

वरिष्ठ आलोचक सुधीश पचौरी के अनुसार राजनीति में वैचारिक संघर्ष अब केवल सत्ता की कुर्सी तक सीमित होकर रह गया है, जो लोकतंत्र के लिए एक नई चुनौती है।
नई दिल्ली और वैश्विक स्तर पर भारतीय विमर्श के बीच, राजनीति के गिरते मूल्यों और सत्ता की ललक पर वरिष्ठ लेखक और आलोचक सुधीश पचौरी के विचारों ने एक नई बहस छेड़ दी है। पचौरी का मानना है कि समकालीन राजनीति में हर वैचारिक यात्रा, हर आंदोलन और हर कहानी का अंत अंततः एक 'कुर्सी' पर जाकर होता है। उनके अनुसार, यह केवल सत्ता का परिवर्तन नहीं बल्कि उस शुचिता का अंत है जो कभी सार्वजनिक जीवन का आधार हुआ करती थी।
पचौरी के ये विचार ऐसे समय में आए हैं जब भारत से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक बसे प्रवासी भारतीय समुदाय के बीच राजनीतिक ध्रुवीकरण और सत्ता संघर्ष चर्चा का मुख्य केंद्र बना हुआ है। सिडनी और मेलबर्न के बौद्धिक हलकों में भी अक्सर इस बात पर चर्चा होती है कि क्या राजनीति अब केवल संख्याबल और सत्ता की कुर्सी हथियाने का खेल बनकर रह गई है। पचौरी के तर्क इस ओर इशारा करते हैं कि आज के दौर में विचारधाराएं केवल एक आवरण हैं, जिनका इस्तेमाल सत्ता तक पहुँचने के लिए एक सीढ़ी के रूप में किया जाता है।
लेखक का तर्क है कि राजनीति का असली 'खेल' अब सिद्धांतों की रक्षा करना नहीं, बल्कि किसी भी तरह से नियंत्रण बनाए रखना है। यह प्रवृत्ति न केवल क्षेत्रीय स्तर पर दिखती है, बल्कि वैश्विक लोकतंत्रों में भी घर कर रही है। जब कोई राजनेता या दल जनता के बीच जाता है, तो वादे जनहित के होते हैं, लेकिन निर्णयों का केंद्र बिंदु हमेशा आगामी चुनाव और सत्ता की कुर्सी को सुरक्षित रखना होता है।
ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय के लिए, जो अक्सर अपनी जड़ों और भारत की राजनीतिक हलचलों से गहरे स्तर पर जुड़ा रहता है, पचौरी का यह विश्लेषण एक आईने की तरह है। यहाँ के प्रवासी भारतीय न केवल भारतीय राजनीति में सक्रिय रुचि रखते हैं, बल्कि वे यह भी देखते हैं कि कैसे सत्ता का यह खेल उनके मूल देश की छवि और नीतियों को प्रभावित करता है। पचौरी के विचार इस बात पर जोर देते हैं कि जब तक राजनीति का अंतिम लक्ष्य केवल व्यक्तिगत या दलीय सत्ता रहेगी, तब तक आम नागरिक के सरोकार हाशिए पर ही रहेंगे।
अंत में, सुधीश पचौरी का यह प्रहार उस व्यवस्था पर है जहाँ नैतिकता का स्थान अवसरवाद ने ले लिया है। उनका मानना है कि जब राजनीति की हर कहानी एक कुर्सी पर खत्म होती है, तो वह कहानी समाज को प्रेरित करने के बजाय उसे विभाजित करने का काम करती है। यह समय है कि राजनीतिक विमर्श में कुर्सी के बजाय 'कर्तव्य' को प्राथमिकता दी जाए, ताकि लोकतंत्र अपनी मूल भावना के साथ जीवित रह सके।
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