ऑस्ट्रेलिया
दिल की बीमारियों का बदलता स्वरूप: भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई युवाओं में बढ़ता हृदय रोग का खतरा
ICN24 Newsroom 5 अग॰ 2026, 06:37 pm

विशेषज्ञों का कहना है कि अब हृदय रोग केवल बुजुर्गों की बीमारी नहीं रही। भारतीय मूल के लोगों में यह समस्या विकसित देशों की तुलना में दस साल पहले देखी जा रही है।
हृदय रोगों के प्रति वैश्विक धारणा तेजी से बदल रही है। लंबे समय तक यह माना जाता रहा है कि दिल का दौरा या हृदय संबंधी समस्याएं बढ़ती उम्र के साथ आती हैं, लेकिन हालिया आंकड़े एक चिंताजनक तस्वीर पेश कर रहे हैं। कुआलालंपुर के प्रसिद्ध कार्डियक वैस्कुलर सेंट्रल में कार्डियोलॉजिस्ट दातुक डॉ. रोसली मोहम्मद अली के अनुसार, दक्षिण एशियाई और विशेष रूप से मलेशियाई जैसे समुदायों में विकसित देशों की तुलना में दिल के दौरे लगभग दस साल पहले पड़ रहे हैं। यह रुझान ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए भी एक बड़ी चेतावनी है।
ऑस्ट्रेलियाई स्वास्थ्य प्रणाली में भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है, लेकिन स्वास्थ्य के मोर्चे पर यह समुदाय आनुवंशिक रूप से हृदय रोगों के प्रति अधिक संवेदनशील पाया गया है। शोध बताते हैं कि दक्षिण एशियाई मूल के लोगों में कोरोनरी आर्टरी डिजीज (CAD) होने की संभावना अन्य समुदायों की तुलना में काफी अधिक होती है। डॉ. रोसली के निष्कर्षों को अगर ऑस्ट्रेलियाई संदर्भ में देखा जाए, तो यह स्पष्ट है कि 30 और 40 की उम्र के बीच के युवा भारतीय अब हृदय रोगों के निशाने पर हैं।
इस समस्या का एक प्रमुख कारण 'मेटाबोलिक सिंड्रोम' है। दक्षिण एशियाई लोगों में पेट की चर्बी (central obesity), इंसुलिन प्रतिरोध और उच्च ट्राइग्लिसराइड्स का स्तर अधिक होता है। जब इस आनुवंशिक बनावट का मिलन ऑस्ट्रेलिया की पश्चिमी जीवनशैली, उच्च कैलोरी वाले भोजन और शारीरिक निष्क्रियता से होता है, तो हृदय रोगों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। युवा वयस्कों में यह गलतफहमी बनी हुई है कि वे 'अभी बहुत छोटे' हैं, जिससे वे शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज कर देते हैं।
डॉ. रोसली के अनुसार, जीवनशैली में बदलाव और शुरुआती जांच ही इस खतरे को कम करने का एकमात्र तरीका है। ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले प्रवासियों के लिए काम का तनाव और संतुलित आहार की कमी भी एक बड़ी चुनौती है। समय पर स्वास्थ्य जांच न कराना और 'साइलेंट' लक्षणों जैसे कि थकान या सांस फूलने को सामान्य मानना घातक साबित हो सकता है। चिकित्सा विशेषज्ञों का सुझाव है कि 25-30 वर्ष की आयु के बाद नियमित रूप से कोलेस्ट्रॉल और ब्लड प्रेशर की जांच शुरू कर देनी चाहिए।
निष्कर्ष के तौर पर, हृदय रोग का चेहरा अब बदल चुका है। यह अब केवल सेवानिवृत्त लोगों की समस्या नहीं है, बल्कि यह कामकाजी युवाओं के जीवन को भी प्रभावित कर रहा है। भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय को अपनी सांस्कृतिक खान-पान की आदतों में सुधार करने और शारीरिक व्यायाम को दिनचर्या का हिस्सा बनाने की तत्काल आवश्यकता है। रोकथाम ही उपचार से बेहतर है, और इस संदेश को युवा पीढ़ी तक पहुँचाना अनिवार्य हो गया है ताकि भविष्य में हृदय घात के बढ़ते मामलों पर अंकुश लगाया जा सके।
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