लाइव
राजनीति
राजनीति

लैंगिक भेदभाव पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: मनुस्मृति का हवाला देकर पितृसत्तात्मक मानसिकता पर प्रहार

ICN24 Newsroom 12 जून 2026, 01:30 am
लैंगिक भेदभाव पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: मनुस्मृति का हवाला देकर पितृसत्तात्मक मानसिकता पर प्रहार

सुप्रीम कोर्ट ने देश में बढ़ते लैंगिक भेदभाव और भ्रूण लिंग चयन पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए पितृसत्तात्मक सोच को बदलने और कानूनों को सख्ती से लागू करने का निर्देश दिया है।

भारत के उच्चतम न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में देश में व्याप्त पितृसत्तात्मक मानसिकता और लिंग चयन (Sex Selection) की कुप्रथा पर कड़ा प्रहार किया है। न्यायालय ने प्राचीन ग्रंथ 'मनुस्मृति' के श्लोकों का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि जहाँ महिलाओं का सम्मान नहीं होता, वहाँ कोई भी धार्मिक या सामाजिक कार्य फलदायी नहीं होता। न्यायमूर्ति की पीठ ने लिंग चयन को मानवाधिकारों का उल्लंघन बताते हुए इसे समाज के लिए एक गंभीर खतरा करार दिया। अदालत ने पीसीपीएनडीटी (PCPNDT) अधिनियम के ढीले कार्यान्वयन पर नाराजगी जाहिर की। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा कि बेटों की चाहत और बेटियों को बोझ समझने वाली सोच ने भारत के लिंगानुपात को बुरी तरह प्रभावित किया है। कोर्ट ने कहा कि तकनीक का दुरुपयोग कर गर्भ में लिंग की पहचान करना केवल एक कानूनी अपराध नहीं, बल्कि नैतिक पतन का प्रतीक है। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि केवल कानून बना देने से सामाजिक बदलाव नहीं आता। इसके लिए समाज के हर वर्ग को अपनी सोच बदलनी होगी। अदालत ने सरकार को निर्देश दिया कि वह स्वास्थ्य केंद्रों और अल्ट्रासाउंड क्लीनिकों की सख्त निगरानी करे ताकि अवैध लिंग निर्धारण को पूरी तरह रोका जा सके। फैसले में यह भी कहा गया कि महिला सशक्तिकरण और 'बेटी बचाओ' जैसे अभियानों को केवल कागजों तक सीमित न रखकर धरातल पर उतारना अनिवार्य है। ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय के लिए भी यह फैसला विशेष महत्व रखता है। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रवासी भारतीयों के बीच भी कभी-कभी सांस्कृतिक दबाव के कारण बेटे की प्राथमिकता देखी जाती है। ऑस्ट्रेलिया में भी स्वास्थ्य अधिकारी और समुदाय कल्याण संस्थाएं इस विषय पर जागरूकता फैलाने का प्रयास करती रहती हैं ताकि भारतीय मूल के परिवारों में लैंगिक समानता बनी रहे। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी दुनिया भर में फैले भारतीय प्रवासियों को एक मजबूत संदेश देती है कि आधुनिक भारत में पितृसत्तात्मक पूर्वाग्रहों के लिए कोई स्थान नहीं है। अंत में, कोर्ट ने दोहराया कि जब तक समाज में महिलाओं को समान दर्जा और सुरक्षा नहीं मिलती, तब तक राष्ट्र का सर्वांगीण विकास संभव नहीं है। यह निर्णय न केवल कानूनी व्यवस्था के लिए एक दिशा-निर्देश है, बल्कि भारतीय समाज के लिए एक आईना भी है जो हमें अपनी सदियों पुरानी कुरीतियों को त्यागने के लिए प्रेरित करता है।
शेयर:

संबंधित ख़बरें

राजस्थान हाई कोर्ट ने आसाराम को दी 20 दिन की पैरोल; इलाज के लिए जेल से बाहर आएंगे स्वयंभू धर्मगुरु
राजनीति

राजस्थान हाई कोर्ट ने आसाराम को दी 20 दिन की पैरोल; इलाज के लिए जेल से बाहर आएंगे स्वयंभू धर्मगुरु

राजस्थान उच्च न्यायालय ने स्वास्थ्य आधार पर आसाराम को 20 दिनों की पैरोल दी है। अदालत ने राज्य सरकार की आपत्तियों को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया।

5 अग॰ 2026, 02:37 am
ड्रिंकिंग कल्चर और क्रिकेट: बेन स्टोक्स ने इंग्लैंड टीम के बदलते व्यवहार पर साझा किए विचार
राजनीति

ड्रिंकिंग कल्चर और क्रिकेट: बेन स्टोक्स ने इंग्लैंड टीम के बदलते व्यवहार पर साझा किए विचार

इंग्लैंड के टेस्ट कप्तान बेन स्टोक्स ने स्पष्ट किया है कि पेशेवर क्रिकेट अब शराब की संस्कृति से दूर हो गया है, जबकि यूके के क्लब क्रिकेट में यह अब भी गहराई से जुड़ा है।

5 अग॰ 2026, 01:37 am
हरियाणा में दूषित पानी पर सियासत तेज: INLD नेता संपत सिंह ने सरकार को घेरा, 1,698 सैंपल जांच में हुए फेल
राजनीति

हरियाणा में दूषित पानी पर सियासत तेज: INLD नेता संपत सिंह ने सरकार को घेरा, 1,698 सैंपल जांच में हुए फेल

हरियाणा के पूर्व मंत्री संपत सिंह ने सरकारी आंकड़ों का हवाला देते हुए राज्य में स्वच्छ पेयजल के दावों पर सवाल उठाए हैं। ग्रामीण इलाकों में भारी संख्या में पानी के नमूने असुरक्षित पाए गए हैं।

5 अग॰ 2026, 12:37 am