राजनीति
सड़क बनाम संसद: क्या विरोध प्रदर्शन अब भारतीय राजनीति की दिशा तय करेंगे?
ICN24 Newsroom 2 अग॰ 2026, 01:36 pm
वरिष्ठ आलोचक सुधीश पचौरी ने संसदीय गरिमा और सड़क पर होने वाले प्रदर्शनों के बीच बढ़ते टकराव पर सवाल उठाए हैं। क्या डिजिटल दौर में राजनीति बदल रही है?
भारत के बदलते राजनीतिक परिदृश्य में एक मौलिक प्रश्न खड़ा हो गया है: क्या देश की नीतियां अब संसद के बजाय सड़क पर तय होंगी? वरिष्ठ आलोचक और विचारक सुधीश पचौरी ने इसी मुद्दे को उठाते हुए पूछा है कि क्या अब लोकतंत्र का फैसला प्रदर्शनों के माध्यम से होगा। यह बहस ऐसे समय में तेज हुई है जब सरकार और विपक्ष के बीच संवाद की कमी और सड़कों पर बढ़ती सक्रियता ने लोकतांत्रिक संस्थानों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
हाल के वर्षों में भारत ने कई बड़े नागरिक आंदोलनों को देखा है। कृषि कानूनों से लेकर अन्य विधायी निर्णयों तक, सड़क पर हुए प्रदर्शनों ने सरकार को अपने कदम पीछे खींचने या नीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया है। सुधीश पचौरी का तर्क है कि जब संसद में स्वस्थ बहस की जगह गतिरोध ले लेता है, तो राजनीति का केंद्र सड़कों की ओर खिसक जाता है। यह बदलाव एक जीवंत लोकतंत्र के लिए संकेत भी हो सकता है और चुनौती भी, क्योंकि इसमें संसदीय गरिमा के क्षरण का जोखिम बना रहता है।
इस राजनीतिक घमासान के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 'जेन-जी' (Gen-Z) पीढ़ी से जुड़ने के लिए सोशल मीडिया 'रील्स' का उपयोग भी चर्चा का विषय बना हुआ है। प्रधानमंत्री की इन 'जवाबी रीलों' पर सोशल मीडिया दो धड़ों में बंट गया है। जहां एक पक्ष इसे युवाओं की भाषा में संवाद करने की एक आधुनिक और सराहनीय पहल मान रहा है, वहीं आलोचक इसे गंभीर राजनीति का 'सरलीकरण' करार देकर इसका मजाक उड़ा रहे हैं। डिजिटल युग में राजनीतिक संचार के इस नए तरीके ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब केवल भाषणों से काम नहीं चलेगा; विजुअल कंटेंट और तुरंत प्रतिक्रिया का दौर आ गया है।
ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय के लिए भारत की यह राजनीतिक उथल-पुथल विशेष महत्व रखती है। प्रवासी भारतीय न केवल भारत की स्थिरता और विकास में रुचि रखते हैं, बल्कि वे वहां की लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को वैश्विक मानदंडों पर भी तौलते हैं। मेलबर्न और सिडनी जैसे शहरों में रहने वाले भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई अक्सर भारत में हो रहे विरोध प्रदर्शनों और विधायी प्रक्रियाओं के बीच के संतुलन पर चर्चा करते हैं। उनके लिए भारत का एक मजबूत और स्थिर लोकतंत्र बने रहना न केवल भावनात्मक रूप से जरूरी है, बल्कि यह उनकी अंतरराष्ट्रीय पहचान को भी प्रभावित करता है।
अंततः, 'सड़क बनाम संसद' की यह लड़ाई भारत के भविष्य का खाका तैयार कर रही है। पचौरी का सवाल हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम एक ऐसी व्यवस्था की ओर बढ़ रहे हैं जहां जनादेश का फैसला केवल चुनाव में नहीं, बल्कि हर बड़े निर्णय के बाद सड़कों पर होगा। डिजिटल संवाद और जमीनी आंदोलनों के बीच का यह संतुलन ही आने वाले दशकों में भारतीय लोकतंत्र की मजबूती तय करेगा।
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