राजनीति
सीरिया में रूस को लगा बड़ा झटका: सैन्य ठिकानों पर नियंत्रण खोने की खबरों से बढ़ी हलचल
ICN24 Newsroom 16 अग॰ 2026, 10:37 am

सीरिया में रूस के सैन्य दबदबे में कमी आने की खबरें सामने आ रही हैं। यूक्रेन युद्ध के बीच मास्को की रणनीतिक पकड़ ढीली होना वैश्विक भू-राजनीति के लिए एक बड़ा मोड़ है।
सीरिया में रूस के रणनीतिक प्रभाव को लेकर हालिया रिपोर्टों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हलचल पैदा कर दी है। दशकों तक पश्चिम एशिया में अपनी उपस्थिति और बशर अल-असद सरकार के समर्थन के जरिए प्रभुत्व बनाए रखने वाला रूस अब अपने ही सैन्य ठिकानों पर नियंत्रण खोता नजर आ रहा है। कूटनीतिक भाषा को हटाकर देखा जाए तो संकेत स्पष्ट हैं—रूस अब सीरिया में अपने सैन्य अड्डों का स्वतंत्र संचालक नहीं रह गया है। यह बदलाव न केवल रूस के लिए एक बड़ी रणनीतिक विफलता है, बल्कि यह बदलती वैश्विक भू-राजनीति का भी एक स्पष्ट प्रमाण है।
इस स्थिति का सबसे बड़ा कारण रूस का यूक्रेन युद्ध में उलझना माना जा रहा है। पिछले दो वर्षों से अधिक समय से यूक्रेन में जारी संघर्ष ने मास्को के सैन्य संसाधनों और ध्यान को सीरिया से हटाकर अपनी पश्चिमी सीमाओं पर केंद्रित कर दिया है। सीरिया में हाल के हफ्तों में विद्रोही गुटों द्वारा किए गए तेज हमलों और प्रमुख शहरों पर उनके कब्जे ने असद सरकार के साथ-साथ रूसी सुरक्षा तंत्र की कमजोरियों को उजागर कर दिया है। हमा और अलेप्पो जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में रूसी वायुसेना की विफलता ने यह स्पष्ट कर दिया है कि क्रेमलिन अब दो मोर्चों पर पूरी ताकत से लड़ने की स्थिति में नहीं है।
भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय के नजरिए से यह घटनाक्रम काफी महत्वपूर्ण है। भारत के रूस के साथ पुराने और मजबूत रक्षा संबंध रहे हैं, जबकि ऑस्ट्रेलिया एक प्रमुख पश्चिमी सहयोगी के रूप में यूक्रेन के प्रति अपना समर्थन पहले ही स्पष्ट कर चुका है। सीरिया में रूस के प्रभाव का कम होना नई दिल्ली के लिए एक कूटनीतिक चुनौती पेश कर सकता है, क्योंकि भारत को अब एक बहुध्रुवीय दुनिया में अपने हितों को संतुलित करने के लिए नए समीकरण तलाशने होंगे। पश्चिम एशिया में अस्थिरता का सीधा असर वैश्विक ऊर्जा कीमतों और व्यापारिक मार्गों पर पड़ता है, जो ऑस्ट्रेलिया और भारत दोनों की अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित करता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सीरिया से रूस की इस प्रतीकात्मक विदाई या कमजोर पड़ती स्थिति ने क्षेत्र में एक बड़ा शक्ति शून्य पैदा कर दिया है। इस शून्य को भरने के लिए अब तुर्की, ईरान और अन्य क्षेत्रीय ताकतें सक्रिय हो गई हैं। सीरिया में रूसी सैन्य अड्डों, जैसे कि टार्टस नौसैनिक ठिकाना और हमीमिम एयरबेस, की सुरक्षा अब संकट में है। यदि रूस इन ठिकानों से पूरी तरह हाथ धो बैठता है, तो भूमध्य सागर में उसकी पहुंच खत्म हो जाएगी, जो शीत युद्ध के बाद से उसकी विदेश नीति का एक अहम स्तंभ रहा है।
कुल मिलाकर, सीरिया में रूस की मौजूदा स्थिति को उसकी वैश्विक महाशक्ति की छवि के लिए एक गहरा धक्का माना जा रहा है। यह न केवल असद शासन के पतन की शुरुआत हो सकती है, बल्कि यह इस बात का भी संकेत है कि रूस की सैन्य क्षमताएं अब अपनी सीमाओं से दूर प्रभाव बनाए रखने में अक्षम साबित हो रही हैं। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि भारतीय कूटनीति इस बदलते परिवेश में अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को कैसे बनाए रखती है।
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