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आध्यात्मिक मार्ग: प्रतिष्ठा के बीच सामान्य बने रहना ही सच्ची भक्ति, पं. विजयशंकर मेहता का संदेश
ICN24 Newsroom 9 जून 2026, 12:30 pm
प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु पं. विजयशंकर मेहता के अनुसार, सफलता और सामाजिक प्रतिष्ठा मिलने पर मनुष्य को और अधिक विनम्र और सामान्य रहने का प्रयास करना चाहिए।
भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में विनम्रता को सबसे बड़ा गुण माना गया है। प्रसिद्ध कथावाचक और विचारक पं. विजयशंकर मेहता ने अपने हालिया विचारों में इस बात पर जोर दिया है कि भगवान कभी भी अपने भक्त के भीतर अभिमान को पनपने नहीं देते। उनका मानना है कि जैसे-जैसे समाज में व्यक्ति की प्रतिष्ठा और पहचान बढ़ती है, उसे और अधिक सामान्य बनने का प्रयास करना चाहिए। यह दर्शन न केवल व्यक्तिगत शांति के लिए आवश्यक है, बल्कि एक स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए भी अनिवार्य है।
ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय के संदर्भ में यह संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। एक नए देश में अपनी पहचान बनाने और पेशेवर सफलता हासिल करने की होड़ में अक्सर व्यक्ति अपने मूल स्वभाव से दूर हो जाता है। पं. मेहता का तर्क है कि जब हम सफलता के शिखर पर हों, तब हमारा व्यवहार और अधिक सरल होना चाहिए। प्रतिष्ठा अक्सर अहंकार का द्वार खोलती है, लेकिन एक सच्चा साधक वही है जो प्रसिद्धि के शोर में भी अपनी जड़ों और विनम्रता को न खोए।
जीवन में अपमान की स्थिति पर चर्चा करते हुए उन्होंने एक सकारात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। पं. मेहता के अनुसार, यदि कभी कहीं हमारा अपमान हो जाए, तो उससे व्यथित होने या क्रोधित होने के बजाय, उस परिस्थिति का विश्लेषण करना चाहिए। हमें यह सोचना चाहिए कि ऐसी स्थिति क्यों उत्पन्न हुई और उस व्यक्ति या घटना से हम क्या सीख सकते हैं। वास्तव में, अपमान हमें अपने भीतर झांकने और सुधार करने का अवसर प्रदान करता है।
अहंकार का त्याग ही भक्ति का प्रथम चरण है। जब व्यक्ति यह स्वीकार कर लेता है कि उसकी सफलता में ईश्वरीय कृपा और समाज का योगदान है, तो अभिमान स्वतः ही समाप्त होने लगता है। पं. मेहता कहते हैं कि भगवान अपने प्रिय भक्तों को अहंकार से बचाने के लिए समय-समय पर ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न करते हैं जो उन्हें उनकी सीमाओं का आभास कराती हैं। इसलिए, प्रतिकूल परिस्थितियों को भी ईश्वर का आशीर्वाद मानकर स्वीकार करना चाहिए।
अंततः, सामान्य बने रहना ही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। चाहे आप मेलबर्न में हों या मुंबई में, मानवीय मूल्यों और सरलता का कोई विकल्प नहीं है। प्रतिष्ठा का भार उठाने के बजाय, उसे सेवा के अवसर के रूप में देखना चाहिए। जब मन में कृतज्ञता का भाव होता है, तो अपमान का कड़वा घूंट भी आत्म-मंथन का अमृत बन जाता है।
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