राजनीति
संजय बारू का विश्लेषण: भारतीय मध्य वर्ग की आकांक्षाएं और आक्रोश की सुगबुगाहट
ICN24 Newsroom 8 जून 2026, 06:00 am

नीट (NEET) विवाद और युवाओं की उपेक्षा भारत के महत्वाकांक्षी मध्य वर्ग में बढ़ते असंतोष का संकेत दे रही है, जिसका गहरा राजनीतिक प्रभाव पड़ सकता है।
प्रख्यात अर्थशास्त्री और पूर्व प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार संजया बारू ने भारत के वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनके हालिया विश्लेषण 'संजयोवाच' (Sanjayovacha) के केंद्र में भारत का वह महत्वाकांक्षी मध्य वर्ग है, जो दशकों से आर्थिक सुधारों और बेहतर भविष्य की उम्मीद लगाए बैठा है। बारू का तर्क है कि हालिया नीट (NEET) पेपर लीक घोटाला और युवाओं के प्रति सत्ता तंत्र का उदासीन रवैया एक बड़े विद्रोह की आहट हो सकता है।
भारत में शिक्षा और रोजगार केवल जीविका के साधन नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा और वर्ग परिवर्तन की सीढ़ी माने जाते हैं। जब इस व्यवस्था की शुचिता पर सवाल उठते हैं, तो इसका सीधा असर करोड़ों परिवारों के सपनों पर पड़ता है। बारू ने चेतावनी दी है कि युवाओं के गुस्से को 'कॉकरोच' जैसे अपमानजनक शब्दों से दबाना या उनकी अनदेखी करना भारी पड़ सकता है। यह आक्रोश केवल एक परीक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक निराशा का परिणाम है जो सिस्टम की विफलता और घटते अवसरों के कारण पैदा हुई है।
ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय के लिए यह खबर विशेष महत्व रखती है। प्रवासी भारतीयों (NRIs) का एक बड़ा हिस्सा इसी जुझारू मध्य वर्ग से निकलकर विदेश पहुंचा है। वे भारत में अपने पीछे छूटे परिवारों और वहां की शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता को लेकर चिंतित हैं। प्रवासी समुदाय भारत की सॉफ्ट पावर और आर्थिक शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है; ऐसे में भारत के भीतर अस्थिरता या युवाओं का मोहभंग वैश्विक स्तर पर भारतीय कौशल (Indian Talent) की साख को प्रभावित कर सकता है।
बारू के अनुसार, वर्तमान सत्ता पक्ष के लिए चुनौतियां बढ़ रही हैं। सत्ता को बनाए रखने की चाहत और जनता की बढ़ती उम्मीदों के बीच एक बड़ा अंतर पैदा हो गया है। मध्य वर्ग, जो कभी मौजूदा सरकार का सबसे बड़ा समर्थक था, अब खुद को उपेक्षित महसूस कर रहा है। महंगाई, बेरोजगारी और अब शिक्षा के क्षेत्र में भ्रष्टाचार ने इस वर्ग को सोचने पर मजबूर कर दिया है।
निष्कर्ष के तौर पर, यह केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं है, बल्कि एक गहरी राजनीतिक संकट की शुरुआत हो सकती है। यदि सरकार ने समय रहते इन युवाओं के गुस्से को शांत करने और व्यवस्था में पारदर्शिता लाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए, तो 'आकांक्षाओं का यह विद्रोह' भविष्य के चुनावी समीकरणों को पूरी तरह बदल सकता है। भारत का मध्य वर्ग अब केवल वादों से संतुष्ट नहीं होने वाला; उसे परिणाम और सम्मान चाहिए।
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