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TReDS में इंटरऑपरेबिलिटी को बढ़ावा देगा RBI; बाजार में एकाधिकार खत्म करने की तैयारी
ICN24 Newsroom 8 जुल॰ 2026, 12:31 pm
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने TReDS प्लेटफॉर्म्स के बीच इंटरऑपरेबिलिटी लागू करने का निर्णय लिया है ताकि एमएसएमई क्षेत्र में वित्तीय पारदर्शिता बढ़े और चुनिंदा कंपनियों का एकाधिकार समाप्त हो।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने देश के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) को राहत देने और डिजिटल वित्तीय बाजार में निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। केंद्रीय बैंक अब 'ट्रेड रिसीवेबल्स डिस्काउंटिंग सिस्टम' (TReDS) के भीतर इंटरऑपरेबिलिटी (Interoperability) को अनिवार्य बनाने की दिशा में काम कर रहा है। इस कदम का मुख्य उद्देश्य वर्तमान में बाजार में मौजूद कुछ चुनिंदा खिलाड़ियों के वर्चस्व को कम करना और छोटे व्यवसायों के लिए बिल भुनाने की प्रक्रिया को अधिक सुलभ बनाना है।
वर्तमान में, भारत के TReDS बाजार पर तीन प्रमुख संस्थानों का कब्जा है: रिसीवेबल्स एक्सचेंज ऑफ इंडिया (RXIL), इनवॉइसमार्ट (Invoicemart) और M1xchange। मई महीने के RBI डेटा के अनुसार, इनवॉइस डिस्काउंटिंग के कुल कारोबार में इन तीन ऑपरेटरों की हिस्सेदारी लगभग 90 प्रतिशत है। यह स्थिति न केवल नए खिलाड़ियों के लिए बाजार में प्रवेश को कठिन बनाती है, बल्कि एमएसएमई क्षेत्र के लिए विकल्पों को भी सीमित करती है। इंटरऑपरेबिलिटी लागू होने के बाद, एक प्लेटफॉर्म पर पंजीकृत व्यवसाय अन्य प्लेटफॉर्म के माध्यम से भी लेन-देन कर सकेंगे, जिससे पूरी प्रक्रिया अधिक लचीली हो जाएगी।
सिस्टम कैसे काम करेगा, इसे समझने के लिए हम डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में यूपीआई (UPI) का उदाहरण ले सकते हैं। जिस प्रकार यूपीआई के माध्यम से एक बैंक का ग्राहक किसी दूसरे बैंक के क्यूआर कोड पर भुगतान कर सकता है, ठीक उसी तरह TReDS में इंटरऑपरेबिलिटी आने से खरीदार, विक्रेता और फाइनेंसर अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर होने के बावजूद एक साथ व्यापार कर सकेंगे। इससे एमएसएमई को अपने बिलों पर बेहतर डिस्काउंट रेट मिलने की संभावना बढ़ जाएगी, क्योंकि फाइनेंसरों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी।
ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय और वहां के व्यापारियों के लिए भी यह खबर महत्वपूर्ण है। भारत-ऑस्ट्रेलिया मुक्त व्यापार समझौते (ECTA) के बाद से कई प्रवासी भारतीय ऑस्ट्रेलिया से भारत के छोटे और मध्यम उद्योगों के साथ व्यापारिक संबंध बढ़ा रहे हैं। भारत में सुव्यवस्थित और पारदर्शी इनवॉइस डिस्काउंटिंग सिस्टम होने से ऑस्ट्रेलिया स्थित निर्यातकों और निवेशकों को भुगतान की सुरक्षा का भरोसा मिलता है। यदि भारत का एमएसएमई क्षेत्र डिजिटल रूप से अधिक मजबूत और प्रतिस्पर्धी होता है, तो इससे द्विपक्षीय व्यापार में भी तेजी आएगी।
RBI का यह फैसला ऐसे समय में आया है जब भारत अपनी डिजिटल वित्तीय बुनियादी संरचना को विश्व स्तर पर रोल मॉडल के रूप में पेश कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि एकाधिकार समाप्त होने से न केवल लागत में कमी आएगी, बल्कि छोटे शहरों के छोटे उद्यमियों को भी औपचारिक ऋण व्यवस्था से जुड़ने में मदद मिलेगी। आने वाले महीनों में RBI इस तकनीकी एकीकरण के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश जारी कर सकता है, जिससे वित्तीय पारिस्थितिकी तंत्र में एक बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा।
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