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रांची लाठीचार्ज बनाम दिल्ली की राजनीति: छात्र प्रदर्शनों पर राजनीतिक दलों के दोहरे मानदंडों पर उठे सवाल

ICN24 Newsroom 11 अग॰ 2026, 05:37 am
रांची लाठीचार्ज बनाम दिल्ली की राजनीति: छात्र प्रदर्शनों पर राजनीतिक दलों के दोहरे मानदंडों पर उठे सवाल

रांची में छात्रों पर पुलिसिया कार्रवाई और दिल्ली की संसद में मचे हंगामे ने भारतीय राजनीति में विरोध प्रदर्शनों के प्रति अलग-अलग दृष्टिकोणों पर बहस छेड़ दी है।

झारखंड की राजधानी रांची की सड़कों पर हाल ही में जो दृश्य देखने को मिले, उन्होंने एक बार फिर भारतीय राजनीति में विरोध प्रदर्शनों के प्रति अपनाए जाने वाले 'दोहरे मानदंडों' पर बहस छेड़ दी है। एक ओर जहां रांची में अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े और पानी की बौछारें की, वहीं दूसरी ओर देश की राजधानी दिल्ली में इस मुद्दे को लेकर संसद से लेकर सड़क तक सियासी घमासान मचा हुआ है। विपक्षी दल इस मुद्दे पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं, जिससे सरकार और विपक्ष के बीच गतिरोध और गहरा गया है। रांची में छात्र लंबे समय से राज्य की भर्ती नीतियों और परीक्षाओं में अनियमितताओं के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। हालिया विरोध प्रदर्शन के दौरान स्थिति तब बिगड़ गई जब प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड्स तोड़ने की कोशिश की, जिसके जवाब में पुलिस ने बल प्रयोग किया। लाठीचार्ज और पुलिसिया कार्रवाई की इन तस्वीरों ने सोशल मीडिया पर भारी आक्रोश पैदा किया है। हालांकि, इस घटना का राजनीतिकरण दिल्ली के गलियारों में अधिक स्पष्ट रूप से देखने को मिल रहा है। संसद में विपक्ष ने इस मुद्दे को उठाते हुए सरकार को घेरा है, लेकिन सरकार द्वारा बयान देने की पेशकश के बावजूद विपक्षी दल चर्चा के बजाय इस्तीफे की मांग पर अड़े हुए हैं। ऑस्ट्रेलिया में रह रहे प्रवासी भारतीय समुदाय (Diaspora) के लिए भारत की ये आंतरिक हलचलें काफी मायने रखती हैं। कई भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई परिवारों के बच्चे या रिश्तेदार भारत में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं या सरकारी नौकरियों की तैयारी कर रहे हैं। जब भारत में छात्र हितों को लेकर इस तरह का हिंसक टकराव होता है, तो इसका सीधा असर विदेशों में रह रहे भारतीयों की धारणा और उनके परिवारों की सुरक्षा संबंधी चिंताओं पर पड़ता है। सिडनी और मेलबर्न जैसे शहरों में बसे झारखंडी समुदाय के लोग विशेष रूप से इन घटनाओं को लेकर चिंतित हैं, क्योंकि वे अपने गृह राज्य में स्थिरता और न्याय की उम्मीद करते हैं। विश्लेषकों का मानना है कि इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल 'चयनात्मक आक्रोश' (Selective Outrage) का है। जब विपक्षी शासित राज्यों में छात्रों पर कार्रवाई होती है, तो केंद्र में सत्ताधारी दल हमलावर हो जाता है, और जब भाजपा शासित या केंद्र के प्रभाव वाले क्षेत्रों में ऐसा होता है, तो विपक्ष आक्रामक हो जाता है। रांची और दिल्ली की यह खींचतान इसी राजनीतिक खेल का हिस्सा नजर आती है। असली मुद्दा, जो कि छात्रों का भविष्य और प्रशासनिक सुधार है, अक्सर इस सियासी शोर में दबकर रह जाता है। फिलहाल, दिल्ली में संसद की कार्यवाही बाधित है और रांची में तनाव बरकरार है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध प्रदर्शन एक मौलिक अधिकार है, लेकिन जब यह अधिकार हिंसा और कठोर पुलिसिया कार्रवाई में बदल जाता है, तो यह शासन और विपक्ष दोनों की विफलताओं को उजागर करता है। भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय के नजरिए से, भारत में छात्र कल्याण और लोकतांत्रिक संवाद की मजबूती देश की वैश्विक छवि को बनाए रखने के लिए अनिवार्य है। अब देखना यह है कि क्या सरकार और विपक्ष राजनीति से ऊपर उठकर छात्रों की वास्तविक समस्याओं का समाधान निकालने के लिए एक मेज पर आएंगे।
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