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राज्यसभा में सुप्रीम कोर्ट के जजों की संख्या बढ़ाने वाला बिल पास; अब शीर्ष अदालत में होंगे 38 न्यायाधीश

ICN24 Newsroom 6 अग॰ 2026, 07:37 am
राज्यसभा में सुप्रीम कोर्ट के जजों की संख्या बढ़ाने वाला बिल पास; अब शीर्ष अदालत में होंगे 38 न्यायाधीश

राज्यसभा ने सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या 34 से बढ़ाकर 38 करने के लिए संशोधन विधेयक पारित किया, जबकि विपक्ष ने अनुच्छेद 370 पर चर्चा न होने के विरोध में वॉकआउट किया।

भारत की संसद के उच्च सदन, राज्यसभा ने बुधवार को 'सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026' को ध्वनि मत से पारित कर दिया। इस विधेयक के माध्यम से देश की शीर्ष अदालत में स्वीकृत न्यायाधीशों की संख्या को वर्तमान 34 से बढ़ाकर 38 (भारत के मुख्य न्यायाधीश सहित) करने का प्रावधान किया गया है। सरकार का तर्क है कि इस कदम से न्यायपालिका पर बढ़ते बोझ को कम करने और लंबित मामलों के निपटारे में तेजी लाने में मदद मिलेगी। हालांकि, सदन की कार्यवाही के दौरान उस समय हंगामा खड़ा हो गया जब सभापति ने विपक्षी दलों को अनुच्छेद 370 के निरस्तीकरण पर चर्चा करने की अनुमति नहीं दी, जिसके विरोध में इंडिया (INDIA) गठबंधन के सदस्यों ने सदन से वॉकआउट कर दिया। केंद्रीय कानून मंत्री ने विधेयक पेश करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट में बढ़ते मुकदमों की संख्या को देखते हुए ढांचागत सुधार अनिवार्य हैं। वर्तमान में शीर्ष अदालत में हजारों मामले लंबित हैं, जिनमें से कई दशक पुराने हैं। न्यायाधीशों की संख्या में यह वृद्धि केवल प्रशासनिक आवश्यकता नहीं है, बल्कि यह न्याय सुलभ बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। उन्होंने रेखांकित किया कि न्यायाधीशों की संख्या बढ़ने से अधिक संविधान पीठों का गठन संभव हो पाएगा, जिससे महत्वपूर्ण कानूनी व्याख्याओं वाले मामलों में देरी नहीं होगी। ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय के लिए यह खबर विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। ऑस्ट्रेलिया में बसे प्रवासी भारतीय अक्सर भारत में अपनी संपत्ति, पारिवारिक उत्तराधिकार और व्यावसायिक विवादों को लेकर कानूनी प्रक्रियाओं से जुड़े रहते हैं। भारतीय अदालतों में मुकदमों की लंबी अवधि प्रवासियों के लिए एक बड़ी चिंता का विषय रही है। न्यायपालिका की क्षमता में विस्तार से न केवल भारत के नागरिकों को बल्कि विदेशी भारतीयों (NRIs) को भी राहत मिलने की उम्मीद है, क्योंकि इससे 'जस्टिस डिलेड' की स्थिति में सुधार आने की संभावना बढ़ जाती है। सिडनी और मेलबर्न जैसे शहरों में सक्रिय भारतीय कानूनी सलाहकार भी अक्सर भारत की धीमी न्यायिक प्रक्रिया को निवेश के मार्ग में एक बाधा मानते रहे हैं। सदन में चर्चा के दौरान राजनीतिक गतिरोध भी देखने को मिला। जब विपक्षी सांसदों ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के प्रभाव और उसके बाद की स्थिति पर चर्चा करने की मांग की, तो सभापति ने इसे विधेयक के दायरे से बाहर बताते हुए अस्वीकार कर दिया। विपक्ष का तर्क था कि न्यायपालिका से जुड़े किसी भी बड़े बदलाव पर चर्चा के दौरान संवैधानिक संशोधनों के प्रभाव पर बात करना अनिवार्य है। मांग पूरी न होने पर कांग्रेस, टीएमसी और अन्य सहयोगी दलों ने सदन का बहिष्कार किया। ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो 1950 में जब सुप्रीम कोर्ट की स्थापना हुई थी, तब इसमें मुख्य न्यायाधीश सहित केवल आठ न्यायाधीश थे। पिछले कुछ दशकों में मामलों की बढ़ती जटिलता और जनसंख्या के दबाव के कारण समय-समय पर इस संख्या को बढ़ाया गया है। इससे पहले 2019 में न्यायाधीशों की संख्या 31 से बढ़ाकर 34 की गई थी। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि निचली अदालतों में रिक्त पदों को भरना और डिजिटल न्याय प्रणाली को और अधिक सशक्त बनाना भी उतना ही आवश्यक है। इस विधेयक के पारित होने के बाद अब इसे राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा, जिसके बाद यह कानून का रूप ले लेगा।
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