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दिखावे की दुनिया और बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य: एन. रघुरामन ने माता-पिता को दी अहम सलाह
ICN24 Newsroom 6 जुल॰ 2026, 12:31 pm
प्रसिद्ध लेखक एन. रघुरामन ने बच्चों में बढ़ते भावनात्मक तनाव और दिखावे की संस्कृति पर चिंता जताई है, जो उनके मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही है।
आज के डिजिटल और प्रतिस्पर्धी युग में, बच्चों और किशोरों का मानसिक स्वास्थ्य एक गंभीर चिंता का विषय बनकर उभरा है। प्रसिद्ध मैनेजमेंट गुरु और स्तंभकार एन. रघुरामन ने हाल ही में इस ओर ध्यान आकर्षित किया है कि कैसे हमारे बच्चे एक ऐसी दुनिया के जाल में फंसते जा रहे हैं, जहाँ काम और गुणों से अधिक दिखावे (एपेरिएंस) को महत्व दिया जा रहा है। यह प्रवृत्ति न केवल उनकी एकाग्रता को भंग कर रही है, बल्कि उन्हें एक ऐसे भावनात्मक तनाव की ओर धकेल रही है, जिससे बाहर निकलना चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, आज के टीनेजर्स नींद की भारी कमी, शैक्षणिक दबाव और सामाजिक अपेक्षाओं के बोझ तले दबे हुए हैं। ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय के लिए यह मुद्दा और भी प्रासंगिक हो जाता है। यहाँ प्रवासी माता-पिता अक्सर अपने बच्चों से उच्च शैक्षणिक प्रदर्शन की उम्मीद करते हैं, जबकि बच्चे साथ ही साथ पश्चिमी सामाजिक परिवेश और सोशल मीडिया के 'परफेक्ट' दिखने के दबाव के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करते हैं। रघुरामन का तर्क है कि जब समाज दिखावे को वास्तविक उपलब्धि से ऊपर रखने लगता है, तो बच्चों में हीन भावना और असुरक्षा पनपने लगती है।
इस समस्या की जड़ सोशल मीडिया और 'इंस्टेंट ग्रैटिफिकेशन' (तत्काल संतुष्टि) की संस्कृति में है। बच्चे अपनी वास्तविक प्रगति के बजाय इस बात पर अधिक ध्यान केंद्रित कर रहे हैं कि वे दुनिया को कैसे दिख रहे हैं। लाइक्स, कमेंट्स और वर्चुअल फॉलोविंग की दौड़ ने उनके आत्म-सम्मान को बाहरी कारकों पर निर्भर कर दिया है। एन. रघुरामन के अनुसार, माता-पिता को अब यह समझना होगा कि बच्चों को इस बाहरी चमक-धमक से बचाकर वास्तविकता की ओर कैसे लाया जाए।
प्रवासी भारतीय परिवारों में अक्सर 'लोग क्या कहेंगे' की भावना प्रबल होती है, जो अनजाने में बच्चों पर अतिरिक्त दबाव डालती है। ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित समाज में, जहाँ प्रतिस्पर्धा केवल ग्रेड्स तक सीमित नहीं है बल्कि लाइफस्टाइल और एक्स्ट्रा-करिकुलर गतिविधियों तक फैली है, वहां बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य प्राथमिकता होना चाहिए। अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों के साथ संवाद स्थापित करें और उन्हें यह समझाएं कि वास्तविक सफलता उनके चरित्र, कड़ी मेहनत और मानसिक शांति में है, न कि सोशल मीडिया प्रोफाइल की दिखावटी सुंदरता में।
अंततः, समाधान बच्चों को गैजेट्स से दूर रखने या केवल पढ़ाई के लिए मजबूर करने में नहीं है। इसके बजाय, उन्हें एक ऐसा वातावरण देने की आवश्यकता है जहाँ 'दिखावे' से ज्यादा 'होने' (बीइंग) को महत्व मिले। यदि हम आज अपने बच्चों को इस कृत्रिम दुनिया के दबाव से नहीं बचाते, तो भविष्य में यह एक बड़े मानसिक स्वास्थ्य संकट का रूप ले सकता है। रघुरामन का यह संदेश भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय के लिए एक चेतावनी भी है और एक दिशा-निर्देश भी, ताकि वे अपनी अगली पीढ़ी को मानसिक रूप से सुदृढ़ बना सकें।
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