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विशेष विश्लेषण: समकालीन राजनीति का संकट और बिखरते राजनीतिक दलों का यथार्थ

ICN24 Newsroom 11 जून 2026, 01:00 pm
विशेष विश्लेषण: समकालीन राजनीति का संकट और बिखरते राजनीतिक दलों का यथार्थ

वरिष्ठ पत्रकार नवनीत गुर्जर के विचारों के आलोक में आज की राजनीति में तर्क की कमी और शासन की शिथिलता पर एक गहरा विश्लेषण।

आज के दौर में राजनीति केवल सत्ता का खेल बनकर रह गई है, जहाँ नीतिगत तर्क और बौद्धिक विमर्श हाशिए पर चले गए हैं। वरिष्ठ स्तंभकार नवनीत गुर्जर के हालिया विश्लेषण के अनुसार, भारतीय राजनीति वर्तमान में एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ निर्णय लेने की क्षमता पूरी तरह पंगु नजर आती है। यह केवल किसी एक दल की समस्या नहीं है, बल्कि पूरे तंत्र की विफलता है जो हठधर्मिता और वैचारिक शून्यता के कारण उत्पन्न हुई है। लेखक का तर्क है कि जब राजनीति में तर्क का अंत हो जाता है और बुद्धि थक जाती है, तो समाज को गंभीर परिणाम भुगतने पड़ते हैं। वीरप्पन जैसे अपराधियों का लंबे समय तक कानून से बचते रहना या नक्सलवाद जैसी आंतरिक चुनौतियों का दशकों तक बना रहना, शासन की उसी शिथिलता का प्रमाण है। जब सरकारें केवल मूकदर्शक बनी रहती हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि राजनीति ने अपनी मूल शक्ति और इच्छाशक्ति खो दी है। आधुनिक लोकतंत्र में राजनीतिक दल अब सिद्धांतों के बजाय व्यक्तित्वों और तात्कालिक लाभ के इर्द-गिर्द सिमट रहे हैं। पार्टियों का बिखरना और विचारधाराओं का कमजोर होना इस बात का संकेत है कि हम सामूहिक हित के बजाय व्यक्तिगत अहंकार को प्राथमिकता दे रहे हैं। यह स्थिति न केवल भारत के लिए बल्कि वैश्विक स्तर पर रह रहे भारतीय समुदायों के लिए भी चिंता का विषय है, क्योंकि एक कमजोर राजनीतिक ढांचा राष्ट्र की सुरक्षा और प्रगति को बाधित करता है। ऑस्ट्रेलिया में रह रहे प्रवासी भारतीयों के लिए भारत की राजनीतिक स्थिरता विशेष महत्व रखती है। प्रवासी समुदाय अक्सर अपनी जड़ों से जुड़े रहते हैं और भारत की आंतरिक सुरक्षा एवं नीतिगत स्पष्टता का सीधा प्रभाव उनके निवेश और सांस्कृतिक संबंधों पर पड़ता है। यदि भारत के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया बाधित होती है, तो इसका असर वैश्विक मंच पर भारत की साख पर भी पड़ता है। निष्कर्षतः, आज की राजनीति को पुनर्जीवित करने के लिए तर्क, संवाद और निर्णायक नेतृत्व की आवश्यकता है। केवल नारों और हठ से किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता। समय आ गया है कि राजनीतिक दल आत्ममंथन करें और उस 'पंगु' अवस्था से बाहर निकलें जो वर्तमान में उनके अस्तित्व को चुनौती दे रही है।
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