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ग्राहम प्लैटनर का 'लिसन टू अस' सर्वे बना मजाक का पात्र; इंटरनेट यूजर्स ने की जमकर ट्रोलिंग

ICN24 Newsroom 9 जुल॰ 2026, 08:31 am
ग्राहम प्लैटनर का 'लिसन टू अस' सर्वे बना मजाक का पात्र; इंटरनेट यूजर्स ने की जमकर ट्रोलिंग

ग्राहम प्लैटनर के चुनाव अभियान द्वारा जारी किया गया एक सर्वेक्षण उस समय विवादों में घिर गया जब एक तकनीकी चूक के कारण यह सार्वजनिक हो गया और इंटरनेट यूजर्स ने इसे ट्रोल करना शुरू कर दिया।

ग्राहम प्लैटनर के राजनीतिक अभियान को उस समय एक बड़ी सार्वजनिक शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा, जब उनके 'लिसन टू अस' (हमारी बात सुनें) नामक एक सर्वेक्षण का लिंक गलत हाथों में पड़ गया। समर्थकों के लिए विशेष रूप से तैयार किया गया यह सर्वेक्षण एक तकनीकी खामी की वजह से सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हो गया, जिसके बाद इंटरनेट यूजर्स ने इसे एक 'सवेज ट्रोल फेस्ट' में बदल दिया। रिपोर्ट के अनुसार, प्लैटनर के अभियान दल ने आज दोपहर अपने चुनिंदा समर्थकों को बड़े पैमाने पर टेक्स्ट संदेश भेजे थे। इस संदेश में एक सर्वेक्षण का लिंक शामिल था, जिसमें उनके प्रशंसकों से दो विशिष्ट प्रश्न पूछे गए थे। हालांकि, अभियान की ओर से एक बड़ी चूक यह हुई कि यह लिंक केवल लक्षित दर्शकों तक सीमित नहीं रहा और इसे कोई भी एक्सेस कर सकता था। जैसे ही यह लिंक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर वायरल हुआ, वैसे ही आलोचकों और इंटरनेट ट्रोलर्स ने इसमें अपमानजनक और मजाकिया जवाब भरने शुरू कर दिए। यह घटना राजनीतिक अभियानों में डिजिटल सुरक्षा और डेटा प्रबंधन की बढ़ती चुनौतियों को रेखांकित करती है। ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए, जो स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय रूप से भाग लेता है, यह मामला डिजिटल साक्षरता और ऑनलाइन गोपनीयता के महत्व को दर्शाता है। अक्सर राजनीतिक दल मतदाताओं से जुड़ने के लिए एसएमएस मार्केटिंग का सहारा लेते हैं, लेकिन प्लैटनर के मामले ने दिखाया है कि बिना उचित सुरक्षा प्रोटोकॉल के यह रणनीति आत्मघाती साबित हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि प्लैटनर के अभियान के लिए यह एक बड़ा झटका है, क्योंकि जिस सर्वेक्षण का उद्देश्य फीडबैक प्राप्त करना था, वह अब उनके विरोधियों के लिए एक हथियार बन गया है। सोशल मीडिया पर यूजर्स इस सर्वेक्षण के स्क्रीनशॉट साझा कर रहे हैं, जिनमें अजीबोगरीब और व्यंग्यात्मक उत्तर दिए गए हैं। 'लिसन टू अस' का नारा अब अभियान के लिए उल्टा पड़ता दिख रहा है, क्योंकि जनता अब उन तरीकों से अपनी प्रतिक्रिया दे रही है जिसकी टीम ने कभी कल्पना भी नहीं की थी। ऑस्ट्रेलियाई चुनावी परिदृश्य में भी डिजिटल अभियानों की विश्वसनीयता पर लगातार चर्चा हो रही है। भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई मतदाता, जो अक्सर मोबाइल संदेशों और सोशल मीडिया विज्ञापनों के माध्यम से राजनीतिक संवाद प्राप्त करते हैं, ऐसे डेटा लीक या तकनीकी विफलताओं के प्रति काफी संवेदनशील हैं। प्लैटनर की यह गलती न केवल उनके अभियान की छवि को नुकसान पहुंचाती है, बल्कि यह अन्य उम्मीदवारों के लिए भी एक चेतावनी है कि वे अपनी डिजिटल आउटरीच रणनीतियों में अधिक सावधानी बरतें। फिलहाल, प्लैटनर अभियान की ओर से इस मामले पर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण नहीं आया है। हालांकि, इंटरनेट पर इस 'ट्रोल फेस्ट' की गूंज अभी शांत होती नहीं दिख रही है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या अभियान दल इस क्षति को नियंत्रित कर पाता है या फिर यह घटना आगामी चुनावों में उनके लिए एक बड़ी बाधा साबित होगी।
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