राजनीति
एक देश, एक चुनाव: भारतीय राजनीति में बढ़ती सुगबुगाहट और इसके संवैधानिक निहितार्थ
ICN24 Newsroom 12 जून 2026, 10:01 am

भारत में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने के प्रस्ताव पर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। भाजपा सरकार इस बड़े सुधार की दिशा में बढ़ती दिख रही है।
भारत की राजनीति में इन दिनों 'एक देश, एक चुनाव' का विचार एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। केंद्र की सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), जिसके पास लोकसभा में स्पष्ट बहुमत है, इस दिशा में गंभीरता से कदम बढ़ाती नजर आ रही है। आगामी आम चुनावों में अपनी जीत के प्रति आश्वस्त भाजपा का मानना है कि बार-बार होने वाले चुनावों से न केवल सरकारी खजाने पर आर्थिक बोझ बढ़ता है, बल्कि विकास कार्य भी प्रभावित होते हैं।
वरिष्ठ पत्रकार ललित सुरजन के दृष्टिकोण से देखें तो यह केवल प्रशासनिक सुधार का मामला नहीं है, बल्कि यह भारतीय संघीय ढांचे के भविष्य से जुड़ा एक बड़ा सवाल है। समर्थकों का तर्क है कि हर कुछ महीनों में किसी न किसी राज्य में चुनाव होने से 'आदर्श चुनाव आचार संहिता' लागू हो जाती है, जिससे नीतिगत निर्णय लेने में देरी होती है। एक साथ चुनाव कराने से प्रशासनिक मशीनरी का ध्यान शासन पर केंद्रित रहेगा और सुरक्षा बलों पर पड़ने वाला दबाव भी कम होगा।
हालांकि, विपक्षी दल और कई राजनीतिक विश्लेषक इसे संवैधानिक चुनौती के रूप में देख रहे हैं। आलोचकों का तर्क है कि यदि किसी राज्य सरकार का कार्यकाल समय से पहले समाप्त हो जाता है या त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति बनती है, तो उसे राष्ट्रीय कैलेंडर के साथ कैसे समायोजित किया जाएगा? इसके अलावा, क्षेत्रीय दलों को डर है कि राष्ट्रीय मुद्दों के शोर में स्थानीय और क्षेत्रीय मुद्दे दब सकते हैं।
ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय के लिए भी यह घटनाक्रम विशेष महत्व रखता है। प्रवासी भारतीयों (NRIs) के बीच भारतीय लोकतंत्र की कार्यप्रणाली को लेकर हमेशा गहरी रुचि रहती है। ऑस्ट्रेलिया की अनिवार्य मतदान प्रणाली और यहां की चुनावी प्रक्रिया के अभ्यस्त भारतीय प्रवासियों के लिए भारत का यह प्रस्तावित बदलाव एक बड़ा लोकतांत्रिक प्रयोग हो सकता है। यह न केवल चुनावी प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करेगा, बल्कि भारत की राजनीतिक स्थिरता को भी प्रभावित करेगा।
निष्कर्षतः, एक साथ चुनाव कराने का विचार सुनने में आकर्षक लग सकता है, लेकिन इसे लागू करने के लिए संविधान में व्यापक संशोधनों और सभी राजनीतिक दलों के बीच आम सहमति की आवश्यकता होगी। भाजपा के पास संख्या बल तो है, लेकिन लोकतांत्रिक मर्यादाओं को बनाए रखते हुए इस सुधार को धरातल पर उतारना एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
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