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अल्जाइमर की नई दवा शुरुआती चरण में सबसे प्रभावी: बेंगलुरु के डॉक्टरों ने दी महत्वपूर्ण जानकारी
ICN24 Newsroom 20 जून 2026, 10:07 am

बेंगलुरु के चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि अल्जाइमर की नई दवाएं रोग के शुरुआती लक्षणों में सबसे अधिक कारगर हैं, जिससे समय पर निदान का महत्व बढ़ गया है।
बेंगलुरु के प्रमुख न्यूरोलॉजिस्ट और चिकित्सा विशेषज्ञों ने अल्जाइमर रोग के उपचार में एक नई उम्मीद जगाई है। हालिया नैदानिक आंकड़ों और अनुभवों के आधार पर, डॉक्टरों ने स्पष्ट किया है कि बाजार में आ रही अल्जाइमर की नई दवाएं उन मरीजों के लिए सबसे अधिक प्रभावी साबित हो रही हैं जो बीमारी के शुरुआती चरण में हैं। यह जानकारी ऐसे समय में आई है जब वैश्विक स्तर पर डिमेंशिया और अल्जाइमर के मामलों में तेजी से वृद्धि देखी जा रही है।
बेंगलुरु के विशेषज्ञों के अनुसार, ये नई दवाएं, जिनमें मुख्य रूप से मोनोक्लोनल एंटीबॉडी शामिल हैं, मस्तिष्क में जमा होने वाले अमाइलॉइड प्लाक (amyloid plaques) को लक्षित करती हैं। डॉक्टरों का कहना है कि एक बार जब बीमारी गंभीर रूप ले लेती है और मस्तिष्क की कोशिकाओं को व्यापक नुकसान पहुंच जाता है, तो इन दवाओं का प्रभाव काफी कम हो जाता है। इसलिए, 'अर्ली डायग्नोसिस' या शुरुआती पहचान अब इलाज की सफलता की पहली शर्त बन गई है।
भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय के लिए यह खबर विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। आंकड़ों के अनुसार, दक्षिण एशियाई मूल के लोगों में मधुमेह और उच्च रक्तचाप जैसी जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां अधिक होती हैं, जो आगे चलकर वैस्कुलर डिमेंशिया और अल्जाइमर के जोखिम को बढ़ा सकती हैं। ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय प्रवासियों के लिए, जिनके बुजुर्ग माता-पिता भारत में रह रहे हैं, यह जानकारी समय पर स्वास्थ्य जांच के महत्व को रेखांकित करती है।
बेंगलुरु स्थित फोर्टिस अस्पताल और निमहंस (NIMHANS) के विशेषज्ञों ने साझा किया कि भूलने की बीमारी को अक्सर बढ़ती उम्र का सामान्य हिस्सा मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि यदि किसी व्यक्ति को हाल की घटनाएं याद रखने में कठिनाई हो रही है या वह परिचित रास्तों को भूल रहा है, तो तुरंत न्यूरोलॉजिस्ट से संपर्क करना चाहिए। पीईटी स्कैन (PET scan) और एमआरआई के माध्यम से शुरुआती चरण में ही मस्तिष्क में होने वाले बदलावों का पता लगाया जा सकता है।
हालांकि, डॉक्टरों ने यह भी स्पष्ट किया कि ये दवाएं पूरी तरह से इलाज (cure) नहीं हैं, बल्कि ये बीमारी के बढ़ने की गति को धीमा कर देती हैं। इसके अलावा, इन दवाओं की उच्च लागत और भारत में इनकी उपलब्धता अभी भी एक चुनौती बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में जैसे-जैसे दवाएं अधिक सुलभ होंगी, प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल स्तर पर जागरूकता बढ़ाना अनिवार्य होगा। ऑस्ट्रेलिया में भी थेराप्यूटिक गुड्स एडमिनिस्ट्रेशन (TGA) इन दवाओं की समीक्षा कर रहा है, जिससे भविष्य में दोनों देशों के बीच स्वास्थ्य सहयोग और ज्ञान साझा करने के नए रास्ते खुल सकते हैं।
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