राजनीति
जबलपुर हाईकोर्ट की बड़ी कार्रवाई: आदेश की अनदेखी पर ACS समेत तीन आला अफसरों के खिलाफ वारंट जारी
ICN24 Newsroom 9 जुल॰ 2026, 07:31 pm

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने आदेशों की अवहेलना करने पर अतिरिक्त मुख्य सचिव सहित तीन वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ 25,000 रुपये का जमानती वारंट जारी किया है।
मध्य प्रदेश की न्यायिक व्यवस्था में एक अभूतपूर्व कड़ा रुख अपनाते हुए, जबलपुर स्थित उच्च न्यायालय ने राज्य प्रशासन के शीर्ष अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की है। न्यायमूर्ति जी.एस. अहलूवालिया की एकल पीठ ने अदालत के स्पष्ट आदेशों की अवहेलना करने और सुनवाई के दौरान अनुपस्थित रहने पर राज्य के अतिरिक्त मुख्य सचिव (ACS), वित्त विभाग के प्रमुख सचिव और किसान कल्याण एवं कृषि विकास विभाग के संचालक के खिलाफ 25-25 हजार रुपये के जमानती वारंट जारी किए हैं। यह आदेश न केवल प्रशासनिक लापरवाही को रेखांकित करता है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि न्यायपालिका की गरिमा सर्वोपरि है।
मामले की जड़ें एक लंबे समय से लंबित अवमानना याचिका में छिपी हैं। बताया जा रहा है कि कोर्ट ने पहले भी इन अधिकारियों को मामले में जवाब पेश करने और व्यक्तिगत रूप से या वकील के माध्यम से उपस्थित होने के निर्देश दिए थे। हालांकि, बार-बार दिए गए अवसरों के बावजूद अधिकारियों की ओर से न तो कोई संतोषजनक जवाब आया और न ही वे अदालत में हाजिर हुए। कोर्ट ने इसे न्याय प्रक्रिया में जानबूझकर बाधा डालने और अदालत की अवमानना माना है। न्यायमूर्ति अहलूवालिया ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि अधिकारी खुद को कानून से ऊपर न समझें और अदालती आदेशों का पालन करना उनकी संवैधानिक जिम्मेदारी है।
भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के इतने वरिष्ठ स्तर के अधिकारियों के खिलाफ वारंट जारी होना राज्य के गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। आमतौर पर, सरकार की ओर से पैरवी करने वाले वकील ऐसे मामलों में समय मांगते हैं, लेकिन इस बार कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि सुनवाई को और अधिक टाला नहीं जा सकता। अधिकारियों को अब पुलिस महानिदेशक (DGP) के माध्यम से यह वारंट तामील कराए जाएंगे, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि वे अगली निर्धारित तिथि पर अदालत के समक्ष प्रस्तुत हों।
ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय और विशेष रूप से मध्य प्रदेश मूल के प्रवासियों के लिए यह समाचार प्रशासनिक सुधारों और न्यायिक जवाबदेही के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। भारत में अक्सर नौकरशाही की कार्यप्रणाली और 'रेड टैपिज्म' (लालफीताशाही) की आलोचना होती रही है। ऐसे में हाईकोर्ट का यह सख्त कदम एक मिसाल के रूप में देखा जा रहा है। यह दर्शाता है कि भारतीय न्यायपालिका शासन के उच्चतम स्तरों पर बैठे व्यक्तियों से भी जवाबदेही मांगने में सक्षम और प्रतिबद्ध है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की कार्रवाइयों से सरकारी विभागों में लंबित मामलों के निपटारे में तेजी आएगी। अक्सर देखा गया है कि सेवा संबंधी मामलों या पेंशन से जुड़ी याचिकाओं में अधिकारी टालमटोल की नीति अपनाते हैं, जिससे आम नागरिक और सेवानिवृत्त कर्मचारी वर्षों तक अदालतों के चक्कर काटते रहते हैं। जबलपुर हाईकोर्ट का यह फैसला राज्य के अन्य विभागों के लिए भी एक चेतावनी है कि वे न्यायिक आदेशों को हल्के में न लें। अब सबकी नजरें अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां इन अधिकारियों को अपनी अनुपस्थिति का ठोस कारण बताना होगा।
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