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भारतीय सिनेमा की पहली बाल कलाकार मंदाकिनी अठावले: दादा साहेब फाल्के की विरासत की अनकही कहानी
ICN24 Newsroom 17 अग॰ 2026, 06:37 pm

भारतीय सिनेमा के जनक दादा साहेब फाल्के की बेटी मंदाकिनी अठावले फिल्मों में काम करने वाली पहली बाल कलाकार थीं, जिन्होंने 1918 में इतिहास रचा था।
भारतीय सिनेमा आज दुनिया भर में अपनी एक विशिष्ट पहचान बना चुका है। ऑस्ट्रेलिया के सिडनी और मेलबर्न जैसे शहरों में भी भारतीय फिल्मों का क्रेज सिर चढ़कर बोलता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस सिनेमाई सफर की शुरुआत दादा साहेब फाल्के ने की थी, उसमें पहली बाल कलाकार की भूमिका किसने निभाई थी? वह कोई और नहीं बल्कि फाल्के साहब की अपनी बेटी, मंदाकिनी अठावले थीं। मंदाकिनी ने न केवल परदे पर अभिनय किया, बल्कि भारतीय समाज में उस समय व्याप्त रूढ़ियों को भी चुनौती दी।
वर्ष 1913 में 'राजा हरिश्चंद्र' के साथ भारतीय सिनेमा की नींव रखने वाले धुंडीराज गोविंद फाल्के (दादा साहेब फाल्के) को अपनी फिल्मों के लिए कलाकार खोजने में काफी मशक्कत करनी पड़ती थी। उस दौर में सभ्य समाज के लोग अभिनय को अच्छा नहीं मानते थे। यहाँ तक कि महिलाओं के किरदार भी पुरुष ही निभाया करते थे। ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में, दादा साहेब ने अपने परिवार को ही अपनी ताकत बनाया। जब 1918 में फिल्म 'श्री कृष्ण जन्म' की तैयारी शुरू हुई, तब बाल कृष्ण की भूमिका के लिए उन्हें एक ऐसे चेहरे की तलाश थी जो मासूमियत और दिव्यता को दर्शा सके। यह तलाश उनकी अपनी बेटी मंदाकिनी पर जाकर खत्म हुई।
मंदाकिनी अठावले ने मात्र सात वर्ष की आयु में 'श्री कृष्ण जन्म' में भगवान कृष्ण का मुख्य किरदार निभाया। यह भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक क्रांतिकारी कदम था। इसके बाद 1919 में आई फिल्म 'कालिया मर्दन' में भी उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। 'कालिया मर्दन' के उस दृश्य को आज भी याद किया जाता है जिसमें नन्ही मंदाकिनी कालिया नाग के फन पर नृत्य करती दिखाई देती हैं। उस समय के सीमित संसाधनों और बिना किसी विशेष तकनीक के, एक छोटी बच्ची का ऐसा सहज अभिनय करना वास्तव में विस्मयकारी था।
आज के समय में जब हम बॉलीवुड और क्षेत्रीय सिनेमा के वैश्विक विस्तार की बात करते हैं, तो मंदाकिनी अठावले जैसी हस्तियों का योगदान और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। उन्होंने ऐसे समय में कैमरे का सामना किया जब सिनेमा को एक पेशा मानना तो दूर, उसे देखना भी कई परिवारों में वर्जित था। उनकी सफलता ने अन्य कलाकारों के लिए दरवाजे खोले और सिनेमा को एक पारिवारिक कला के रूप में स्थापित करने में मदद की।
ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय के लिए, जो अपनी जड़ों और संस्कृति से गहरा जुड़ाव रखते हैं, मंदाकिनी अठावले की यह कहानी हमारी सांस्कृतिक विरासत का एक अहम हिस्सा है। यह याद दिलाती है कि भारतीय सिनेमा की भव्यता के पीछे एक पिता और उसकी बेटी का अटूट विश्वास और समर्पण छिपा है। मंदाकिनी ने अपनी दो प्रमुख फिल्मों के बाद अभिनय को अलविदा कह दिया और सामान्य जीवन बिताया, लेकिन भारतीय फिल्म जगत के इतिहास में उनका नाम पहली बाल कलाकार के रूप में हमेशा के लिए दर्ज हो गया।
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