राजनीति
जबलपुर हाईकोर्ट ने पूर्व आरटीओ आरक्षक सौरभ शर्मा को दी जमानत: 52 किलो सोना और 11 करोड़ की नकदी मामले में मिली राहत
ICN24 Newsroom 5 अग॰ 2026, 06:37 am
जबलपुर हाईकोर्ट ने करीब 18 महीने बाद पूर्व आरक्षक सौरभ शर्मा की जमानत मंजूर कर ली है। शर्मा पर जंगल में 52 किलो सोना और 11 करोड़ रुपये छिपाने के गंभीर आरोप हैं।
मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की जबलपुर पीठ ने भ्रष्टाचार और आय से अधिक संपत्ति के मामले में फंसे परिवहन विभाग के पूर्व आरक्षक सौरभ शर्मा को बड़ी राहत दी है। न्यायमूर्ति की एकल पीठ ने करीब 18 महीने की न्यायिक हिरासत के बाद शर्मा की नियमित जमानत याचिका को कुछ कड़े प्रतिबंधों के साथ स्वीकार कर लिया है। अदालत ने आरोपी को 10 लाख रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि की जमानत राशि जमा करने पर रिहा करने का आदेश दिया है।
सौरभ शर्मा फरवरी 2025 से जेल में बंद थे। उन पर आरोप है कि उन्होंने पद का दुरुपयोग करते हुए करोड़ों की अवैध संपत्ति अर्जित की। इस मामले ने तब तूल पकड़ा था जब भोपाल के पास मेंडोरी के जंगलों में एक लावारिस कार से 52 किलोग्राम सोना और करीब 11 करोड़ रुपये नकद बरामद हुए थे। जांच एजेंसियों के अनुसार, यह संपत्ति सौरभ शर्मा की थी, जिसके बाद लोकायुक्त पुलिस और प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने शिकंजा कसा था।
सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर गौर किया कि मामले की मुख्य जांच पूरी हो चुकी है और जांच एजेंसी ने पहले ही चार्जशीट पेश कर दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूंकि आरोपी लंबे समय से जेल में है और मुकदमे में गवाहों की संख्या बहुत अधिक है, इसलिए ट्रायल के जल्द पूरा होने की संभावना कम है। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति को केवल इसलिए अनिश्चितकाल के लिए सलाखों के पीछे नहीं रखा जा सकता क्योंकि मुकदमा लंबा चलने वाला है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने यह भी साफ किया कि जमानत मिलने का अर्थ आरोपों से बरी होना नहीं है। सौरभ शर्मा को कुछ विशिष्ट शर्तों का पालन करना अनिवार्य होगा। उन्हें मुकदमे की हर सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना होगा और वह साक्ष्यों या गवाहों को किसी भी तरह से प्रभावित करने का प्रयास नहीं करेंगे। अदालत की अनुमति के बिना उन्हें देश छोड़ने की अनुमति नहीं दी गई है।
इससे पहले सौरभ शर्मा की जमानत याचिका दो बार निचली अदालतों और हाईकोर्ट से खारिज हो चुकी थी। उन्होंने उच्चतम न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाया था, जहां से याचिका वापस लेकर उन्हें फिर से नए आधार पर आवेदन करने की छूट मिली थी। इसके बाद उन्होंने अपनी पत्नी की गंभीर बीमारी का हवाला देते हुए जमानत मांगी थी, जिसे अंततः लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद स्वीकार कर लिया गया।
यह मामला भारत के प्रशासनिक गलियारों में भ्रष्टाचार की गहरी जड़ों को दर्शाता है। एक छोटे से पद पर रहते हुए इतनी विशाल संपत्ति का संचय करना न केवल विभागीय सतर्कता पर सवाल उठाता है, बल्कि भारतीय प्रवासी समुदाय के बीच भी यह चर्चा का विषय बना हुआ है जो भारत में शासन सुधारों और पारदर्शिता की उम्मीद करते हैं।
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