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3 जुलाई को कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी: विघ्नहर्ता गणेश की आराधना से दूर होंगी बाधाएं; जानें शुभ मुहूर्त और महत्व

ICN24 Newsroom 1 जुल॰ 2026, 02:10 am
3 जुलाई को कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी: विघ्नहर्ता गणेश की आराधना से दूर होंगी बाधाएं; जानें शुभ मुहूर्त और महत्व

आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन भगवान गणेश की पूजा से जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं।

हिंदू पंचांग के अनुसार, प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को संकष्टी चतुर्थी मनाई जाती है। आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली इस चतुर्थी को 'कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी' के नाम से जाना जाता है। इस वर्ष यह शुभ तिथि 3 जुलाई, बुधवार को पड़ रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान श्री गणेश की विधि-विधान से पूजा करने और व्रत रखने से साधक के जीवन से सभी दुख-दर्द और बाधाएं दूर हो जाती हैं। संकष्टी शब्द का अर्थ ही 'संकटों को हरने वाला' होता है। भगवान गणेश को प्रथम पूज्य और विघ्नहर्ता माना गया है, इसलिए किसी भी मांगलिक कार्य से पहले उनकी वंदना की जाती है। कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी के दिन भक्त सूर्योदय से लेकर चंद्रोदय तक उपवास रखते हैं। रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही यह व्रत संपन्न माना जाता है। इस दिन विशेष रूप से गणेश जी के 'कृष्णपिंगल' स्वरूप की पूजा की जाती है और 'पीठा' नामक शक्ति की आराधना का विधान है। शुभ मुहूर्त की बात करें तो आषाढ़ कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि 3 जुलाई को प्रातः काल से प्रारंभ होकर देर रात तक रहेगी। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, इस दिन 'सर्वार्थ सिद्धि योग' जैसे शुभ संयोग भी बन रहे हैं, जो पूजा के फल को कई गुना बढ़ा देते हैं। ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय के लिए भी यह दिन विशेष महत्व रखता है। सिडनी, मेलबर्न, ब्रिसबेन और पर्थ जैसे शहरों में स्थित हिंदू मंदिरों में इस अवसर पर विशेष भजन-कीर्तन और अभिषेक का आयोजन किया जाता है। स्थानीय समयानुसार चंद्रोदय के समय में भिन्नता होने के कारण, श्रद्धालुओं को स्थानीय पंचांग का अनुसरण करने की सलाह दी गई है। पूजा की विधि अत्यंत सरल किंतु श्रद्धापूर्ण है। प्रातः काल स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर भगवान गणेश के समक्ष व्रत का संकल्प लेना चाहिए। पूजा के दौरान उन्हें दूर्वा, अक्षत, सिंदूर और उनके प्रिय मोदक या लड्डू अर्पित करने चाहिए। गणेश चालीसा और संकट नाशन गणेश स्तोत्र का पाठ करना विशेष फलदायी माना जाता है। शाम के समय पुनः गणेश जी की आरती करें और चंद्रमा निकलने का प्रतीक्षा करें। ऑस्ट्रेलियाई प्रवासी भारतीयों के लिए यह त्योहार अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहने का एक माध्यम है। यहाँ के व्यस्त जीवन में भी लोग अपनी परंपराओं को सहेज कर रखते हैं। मंदिरों में सामूहिक पूजा के माध्यम से न केवल नई पीढ़ी को संस्कारों से जोड़ा जाता है, बल्कि सामुदायिक सद्भाव को भी बढ़ावा मिलता है। मान्यता है कि जो व्यक्ति सच्चे मन से इस चतुर्थी का पालन करता है, उसके घर में सुख-समृद्धि और शांति का वास होता है।
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