राजनीति
ईरान ने यूरोपीय देशों को नहीं भेजा सर्वोच्च नेता के अंतिम संस्कार का न्योता; विदेश मंत्रालय ने दी सफाई
ICN24 Newsroom 1 जुल॰ 2026, 08:56 am

ईरान और पश्चिमी देशों के बीच बढ़ते तनाव के बीच, तेहरान ने यूरोपीय राजदूतों को सर्वोच्च नेता के अंतिम संस्कार के कार्यक्रमों से बाहर रखा है।
तेहरान। ईरान और यूरोपीय देशों के बीच जारी राजनयिक कड़वाहट अब एक नए स्तर पर पहुंच गई है। ईरान सरकार ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की है कि उसने अपने सर्वोच्च नेता के अंतिम संस्कार और उससे जुड़े शोक कार्यक्रमों के लिए यूरोपीय देशों को आमंत्रित नहीं करने का निर्णय लिया है। इस कदम को अंतरराष्ट्रीय मंच पर ईरान द्वारा यूरोप के प्रति अपनी नाराजगी जाहिर करने के कड़े संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने इस फैसले की पुष्टि करते हुए कहा कि कुछ पश्चिमी देशों के 'शत्रुतापूर्ण व्यवहार' और ईरान के आंतरिक मामलों में निरंतर हस्तक्षेप को देखते हुए यह कदम उठाया गया है। मंत्रालय के अनुसार, जो देश ईरान की संप्रभुता का सम्मान नहीं करते और प्रतिबंधों के जरिए ईरानी जनता को नुकसान पहुंचा रहे हैं, उन्हें ऐसे गंभीर और सम्मानजनक कार्यक्रमों का हिस्सा बनने का कोई अधिकार नहीं है। विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि न्योता केवल उन्हीं मित्र राष्ट्रों को भेजा गया है जिनके साथ ईरान के संबंध आपसी सम्मान पर आधारित रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान और यूरोपीय संघ (EU) के बीच परमाणु समझौते (JCPOA) के टूटने और हाल के महीनों में मानवाधिकारों के मुद्दे पर बढ़ते विवाद ने इस अलगाव को और गहरा कर दिया है। जहाँ एक ओर रूस, चीन और कई खाड़ी देशों को इन कार्यक्रमों में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया है, वहीं ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी जैसे प्रमुख यूरोपीय देशों की अनुपस्थिति ईरान की विदेश नीति में आए बड़े बदलाव की ओर इशारा करती है।
ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय के लिए यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण है। मध्य पूर्व में बढ़ता तनाव न केवल वैश्विक तेल कीमतों को प्रभावित करता है, बल्कि ऑस्ट्रेलिया की व्यापारिक सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता पर भी सीधा असर डालता है। सिडनी और मेलबर्न में रहने वाले प्रवासी भारतीयों, जिनका व्यापार या परिवार खाड़ी क्षेत्र से जुड़ा है, के लिए ईरान और पश्चिमी देशों के बीच बढ़ती यह दूरी चिंता का विषय बनी हुई है। भारत ने हमेशा ईरान के साथ अपने रणनीतिक संबंधों और पश्चिमी देशों के साथ अपनी साझेदारी के बीच संतुलन बनाए रखा है, ऐसे में यह राजनयिक संकट भारत की कूटनीति के लिए भी एक चुनौती पेश कर सकता है।
फिलहाल, ईरान की इस सख्त घेराबंदी ने यह साफ कर दिया है कि वह अपनी शर्तों पर ही अंतरराष्ट्रीय संबंध आगे बढ़ाना चाहता है। इस फैसले से न केवल यूरोप के साथ बातचीत के रास्ते और बंद होने की आशंका है, बल्कि आने वाले समय में ईरान और पश्चिम के बीच एक नया 'शीत युद्ध' भी शुरू हो सकता है।
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