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तृणमूल कांग्रेस में आंतरिक कलह तेज: काकोली घोष के बयान पर कीर्ति आजाद का पलटवार, ममता बनर्जी की बढ़ी मुश्किलें

ICN24 Newsroom 9 जून 2026, 10:00 pm
तृणमूल कांग्रेस में आंतरिक कलह तेज: काकोली घोष के बयान पर कीर्ति आजाद का पलटवार, ममता बनर्जी की बढ़ी मुश्किलें

तृणमूल कांग्रेस में अंदरूनी कलह सतह पर आ गई है। सांसद काकोली घोष दस्तीदार के हालिया रुख और कीर्ति आजाद की प्रतिक्रिया ने ममता बनर्जी के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।

पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) इस समय अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। पार्टी के भीतर बढ़ती गुटबाजी और नेताओं के बीच सार्वजनिक बयानबाजी ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की चिंताएं बढ़ा दी हैं। ताजा घटनाक्रम में, वरिष्ठ सांसद काकोली घोष दस्तीदार के एक हालिया बयान ने पार्टी के भीतर दरार को स्पष्ट कर दिया है, जिस पर पूर्व क्रिकेटर और सांसद कीर्ति आजाद ने तीखा तंज कसा है। काकोली घोष दस्तीदार के बदले हुए सुरों ने राजनीतिक गलियारों में अटकलों का बाजार गर्म कर दिया है। जानकारों का मानना है कि उनका पार्टी की आधिकारिक लाइन से हटकर बयान देना एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हो सकता है। इस स्थिति ने न केवल संगठन की एकजुटता पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि यह भी संकेत दिया है कि पार्टी के पुराने और नए नेताओं के बीच सामंजस्य की भारी कमी है। कीर्ति आजाद, जो हाल के वर्षों में टीएमसी के एक प्रमुख चेहरा बनकर उभरे हैं, ने काकोली घोष की टिप्पणियों पर कटाक्ष करते हुए इसे अनुशासनहीनता के करीब बताया। यह सार्वजनिक टकराव ऐसे समय में हो रहा है जब ममता बनर्जी राज्य में कई प्रशासनिक और राजनीतिक चुनौतियों का सामना कर रही हैं। पार्टी के भीतर इस तरह की बगावत विपक्षी दलों, विशेषकर भाजपा को हमला करने का नया मौका दे रही है। ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय, विशेष रूप से प्रवासी बंगाली समुदाय के लिए यह घटनाक्रम चिंता का विषय है। सिडनी और मेलबर्न जैसे शहरों में रहने वाले भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई अक्सर बंगाल की राजनीति में गहरी रुचि रखते हैं। वहां के सामाजिक संगठनों में इस बात पर चर्चा हो रही है कि क्या टीएमसी के भीतर का यह असंतोष भविष्य में राज्य की स्थिरता को प्रभावित करेगा। प्रवासी भारतीयों के लिए पश्चिम बंगाल में राजनीतिक स्थिरता प्रत्यक्ष रूप से वहां निवेश और सांस्कृतिक आदान-प्रदान से जुड़ी होती है। फिलहाल, ममता बनर्जी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने कुनबे को बिखरने से बचाने की है। यदि वरिष्ठ नेताओं के बीच यह जुबानी जंग जल्द नहीं थमी, तो आगामी चुनावों में पार्टी को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अभिषेक बनर्जी और पुराने गार्ड्स के बीच सत्ता संतुलन बिठाने की कोशिश में अब दरारें साफ दिखने लगी हैं, जो टीएमसी के भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं हैं।
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