राजनीति
कांग्रेस में आंतरिक हलचल: क्या मल्लिकार्जुन खड़गे का 'विशिष्ट कार्यशैली' पार्टी के लिए चुनौती बन रही है?
ICN24 Newsroom 14 जून 2026, 02:31 pm

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की कार्यशैली और उनके साथ जुड़े भारी-भरकम लाव-लश्कर को लेकर पार्टी के भीतर सुगबुगाहट तेज हो गई है।
नई दिल्ली: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर नेतृत्व और कार्यशैली को लेकर एक बार फिर बहस छिड़ गई है। केरल के मुख्यमंत्री पद के लिए वी.डी. सतीशन के नामांकन में हुई देरी और उसके बाद के घटनाक्रमों ने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व, विशेष रूप से 83 वर्षीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पार्टी के अंदरूनी गलियारों में अब यह चर्चा आम हो गई है कि खड़गे की 'विशिष्ट और खर्चीली' कार्यशैली संगठन के लिए एक बोझ साबित हो सकती है।
वरिष्ठ नेताओं और रणनीतिकारों के एक वर्ग का मानना है कि जिस समय कांग्रेस को एक गतिशील और जमीनी स्तर पर सक्रिय नेतृत्व की आवश्यकता है, उस समय खड़गे के साथ जुड़ा 'अतिरिक्त तामझाम' (excess baggage) पार्टी की छवि और कार्यकुशलता को प्रभावित कर रहा है। आलोचकों का तर्क है कि उनके साथ चलने वाला बड़ा सुरक्षा घेरा, विशेष सुविधाएं और उनके इर्द-गिर्द रहने वाले सलाहकारों की मंडली ने उन्हें आम कार्यकर्ताओं से दूर कर दिया है।
यह स्थिति विशेष रूप से तब और गंभीर हो जाती है जब पार्टी वित्तीय चुनौतियों का सामना कर रही है और देश भर में अपने कैडर को पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रही है। केरल जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में निर्णय लेने में होने वाली देरी को भी इसी सुस्त प्रशासनिक ढांचे से जोड़कर देखा जा रहा है। पार्टी के कुछ सूत्रों का कहना है कि खड़गे के 'प्रेसिडेंशियल' प्रोटोकॉल के कारण त्वरित निर्णय लेना कठिन हो गया है, जिससे चुनावी राज्यों में संदेश स्पष्ट रूप से नहीं पहुंच पा रहा है।
ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए भारत की राजनीतिक अस्थिरता या नेतृत्व की चुनौतियां हमेशा से रुचि का विषय रही हैं। सिडनी और मेलबर्न में बसे प्रवासी भारतीयों का एक बड़ा वर्ग भारतीय राजनीति पर पैनी नजर रखता है और कांग्रेस की आंतरिक कलह उनके बीच चर्चा का विषय बनी रहती है। प्रवासी समुदाय अक्सर भारत में एक मजबूत विपक्ष की वकालत करता है, ऐसे में खड़गे की कार्यशैली पर उठते सवाल विदेशों में भी पार्टी की साख को प्रभावित कर सकते हैं।
हालांकि, खड़गे के समर्थकों का तर्क है कि वह एक अनुभवी नेता हैं जिन्होंने कठिन समय में पार्टी की कमान संभाली है। उनका कहना है कि अध्यक्ष पद की गरिमा और सुरक्षा कारणों से कुछ प्रोटोकॉल अनिवार्य हैं। लेकिन जैसे-जैसे आगामी विधानसभा चुनावों की सरगर्मी बढ़ रही है, कांग्रेस के भीतर यह असंतोष संगठन की एकजुटता के लिए नई चुनौतियां पेश कर सकता है। अब देखना यह होगा कि क्या खड़गे अपनी कार्यशैली में बदलाव लाते हैं या यह आंतरिक खींचतान पार्टी की चुनावी संभावनाओं पर भारी पड़ती है।
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